अरावली में बने परसोन मंदिर पर वन विभाग का नोटिस, 15 दिन में हटेगा अवैध निर्माण में आस्था बनाम कानून, महंत बोले- तोड़फोड़ हुई तो जान दे दूंगा
फरीदाबाद की अरावली पहाड़ियों में स्थित प्राचीन परसोन मंदिर को वन विभाग ने पीएलपीए एक्ट के तहत अवैध निर्माण हटाने का 15 दिन का नोटिस दिया है। महंत ने तोड़फोड़ होने पर आत्महत्या की चेतावनी दी है
■ अरावली की पहाड़ियों में बने प्राचीन परसोन मंदिर को वन विभाग का नोटिस
■ 15 दिन में अवैध निर्माण हटाने के आदेश, पीएलपीए एक्ट का हवाला
■ महंत बोले- तोड़फोड़ हुई तो आत्महत्या कर लूंगा, भक्तों में रोष
फरीदाबाद की अरावली पहाड़ियों की तलहटी में स्थित हजारों वर्ष पुराने माने जाने वाले परसोन मंदिर को वन विभाग ने अवैध निर्माण का नोटिस जारी किया है। विभाग ने मंदिर परिसर में किए गए कथित अवैध ढांचों को हटाने के लिए 15 दिन का समय दिया है और परिसर में दो नोटिस चस्पा किए हैं। नोटिस के बाद मंदिर प्रबंधन और भक्तों में गहरा आक्रोश है। वहीं मंदिर के महंत पराशरण ने भावुक होते हुए कहा कि वह आत्महत्या कर लेंगे, लेकिन मंदिर परिसर में किसी भी प्रकार की तोड़फोड़ नहीं होने देंगे।
26 फरवरी को जारी नोटिस में कहा गया है कि अनखीर गांव स्थित परसोन मंदिर परिसर में बनाए गए कुछ ढांचे पीएलपीए एक्ट का उल्लंघन करते हैं। अरावली क्षेत्र में गैर-वानिकी गतिविधियों पर प्रतिबंध है और यहां केवल पौधारोपण की अनुमति है। इसलिए परिसर में बने अवैध ढांचों को हटाने के निर्देश दिए गए हैं। विभाग ने मंदिर प्रबंधन से संबंधित दस्तावेज भी मांगे हैं।
महंत पराशरण का कहना है कि मंदिर अत्यंत प्राचीन है और उन्होंने केवल छत की मरम्मत और श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए बाथरूम का निर्माण कराया है। वे पिछले 25 वर्षों से यहां रह रहे हैं और मंदिर का मूल स्वरूप जस का तस है। उन्होंने कहा कि यह स्थान उनकी आस्था का प्रतीक है और यहां किसी प्रकार की तोड़फोड़ बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
मंदिर में आने वाले श्रद्धालु सुंदर का कहना है कि यह मंदिर पांच गांवों की आस्था का केंद्र है। बचपन से लोग यहां पूजा-अर्चना के लिए आते रहे हैं। उनका दावा है कि मंदिर महाभारत कालीन है और जो ढांचे हैं वे प्राचीन हैं। केवल जंगली जानवरों से सुरक्षा के लिए कुछ दीवारें खड़ी की गई थीं।
इतिहास और मान्यताओं के अनुसार, अरावली की गोद में तीन ओर पहाड़ियों से घिरा यह मंदिर करीब 250 फुट नीचे तलहटी में स्थित है। मान्यता है कि यहां ऋषि पराशर ने हजार वर्षों तक तपस्या की थी और अपने बाण से अमृत कुंड, हथिया कुंड और ब्रह्मकुंड नामक तीन सरोवर बनाए थे। कहा जाता है कि इन कुंडों में साल भर प्राकृतिक जल भरा रहता है, जबकि अरावली क्षेत्र में पानी की कमी आम बात है।
महंत रामगिरी के अनुसार, यह स्थल महर्षि वेद व्यास का जन्मस्थान भी माना जाता है। वेद व्यास ने 18 महापुराणों और महान ग्रंथ महाभारत की रचना की थी। स्थानीय मान्यताओं में यह भी कहा जाता है कि पांडवों ने अपने अज्ञातवास के दौरान माता कुंती के साथ यहां समय बिताया था।
उधर, डिस्ट्रिक्ट फॉरेस्ट ऑफिसर झलकार ने स्पष्ट किया कि अभी केवल नोटिस जारी किया गया है। जांच के दौरान यह तय किया जाएगा कि कौन सा ढांचा प्राचीन है और उसे संरक्षित रखा जाएगा। जो निर्माण नए पाए जाएंगे, उन पर कानून के अनुसार कार्रवाई होगी। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के आदेशों और पीएलपीए एक्ट के तहत वन क्षेत्र में गैर-वानिकी कार्य नहीं किए जा सकते। जल्द ही मौके का दौरा कर स्थिति का आकलन किया जाएगा।
मंदिर और वन विभाग के बीच यह विवाद अब आस्था बनाम कानून का रूप लेता दिखाई दे रहा है। आने वाले दिनों में प्रशासनिक कार्रवाई और स्थानीय विरोध के बीच यह मुद्दा और गरमा सकता है।
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