धुरंधर की सफलता के पीछे छिपा विवाद, जानें कराची की तस्वीर पर क्यों भड़के फिल्म समीक्षक

फिल्म धुरंधर में कराची की प्रस्तुति पर मयंक शेखर ने सवाल उठाए। फिल्म की व्यावसायिक सफलता के बावजूद इसके कथानक और राजनीतिक रुझान को लेकर आलोचना तेज हुई।

धुरंधर की सफलता के पीछे छिपा विवाद, जानें  कराची की तस्वीर पर क्यों भड़के फिल्म समीक्षक

• फिल्म धुरंधर में कराची की तस्वीर को लेकर फिल्म समीक्षक मयंक शेखर ने सवाल उठाए
• फिल्म को भारत और प्रवासी भारतीयों में व्यावसायिक सफलता, लेकिन आलोचनाएं भी तेज
• बॉलीवुड में अतिराष्ट्रवादी और अल्पसंख्यक विरोधी कथानकों के बढ़ते ट्रेंड पर बहस



मुंबई स्थित फिल्म समीक्षक मयंक शेखर ने फिल्म धुरंधर की प्रस्तुति पर तीखी टिप्पणी की है। उन्होंने कहा कि फिल्म को ऐसे लोगों ने लिखा, निर्देशित और अभिनीत किया है, जो संभवतः कभी कराची गए ही नहीं हैं। उनके अनुसार फिल्म में कराची को एक धूलभरे, उजड़े हुए और आधुनिक इमारतों से रहित शहर के रूप में दिखाया गया है, जो कई गेट्टो में बंटा हुआ नजर आता है।वहीं, फिल्म में पाकिस्तान और बलूचिस्तान से जुड़ी घटनाओं के चित्रण को लेकर बलूच समुदाय में नाराजगी सामने आई है। बलूच समुदाय के कार्यकर्ता मीर यार बलूच ने फिल्म के कंटेंट पर कड़ा एतराज जताते हुए इसे बलूच समाज की छवि को नुकसान पहुंचाने वाला बताया है।

मयंक शेखर का कहना है कि यह तरीका हॉलीवुड फिल्मों की उस प्रवृत्ति से मेल खाता है, जिसमें तीसरी दुनिया के देशों को एक सेपिया टोन में अराजक और पिछड़ा हुआ दिखाया जाता है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे फिल्म एक्सट्रैक्शन में ढाका शहर को दिखाया गया था, वैसी ही छवि यहां भी गढ़ी गई है।

इन आलोचनाओं के बावजूद फिल्म धुरंधर को भारत और प्रवासी भारतीय दर्शकों के बीच जबरदस्त व्यावसायिक सफलता मिली है। हालांकि फिल्म विवादों से भी घिरी रही है। वीरता पुरस्कार से सम्मानित भारतीय सेना के अधिकारी मेजर मोहित शर्मा के परिवार ने दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर आरोप लगाया कि फिल्म में उनकी जिंदगी और सेवा का इस्तेमाल बिना अनुमति किया गया है।

फिल्म निर्माताओं ने इन आरोपों को खारिज करते हुए दावा किया है कि यह पूरी तरह काल्पनिक कहानी है। हालांकि आलोचकों का कहना है कि फिल्म की कहानी में भारत में हुए हमलों से जुड़े इंटरसेप्टेड ऑडियो और वास्तविक न्यूज फुटेज का इस्तेमाल किया गया है, जिससे फिक्शन और वास्तविकता की सीमा धुंधली हो जाती है।

बॉलीवुड के मौजूदा रुझानों पर बात करते हुए मयंक शेखर ने कहा कि अतिरंजित, आक्रामक और अतिराष्ट्रवादी नायक की छवि कोई नई बात नहीं है। उन्होंने इसे 1970 के दशक की एंग्री यंग मैन फिल्मों से जोड़ते हुए कहा कि इस प्रवृत्ति को बार-बार नए सिरे से पेश किया जा रहा है।

विश्लेषकों का मानना है कि हाल के वर्षों में मुख्यधारा की हिंदी फिल्मों में अल्पसंख्यकों को नकारात्मक रूप में दिखाने की प्रवृत्ति बढ़ी है। इसमें अक्सर भारत के भीतर और बाहर के मुसलमानों को आतंकवादी के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, जिससे सांस्कृतिक हाशियाकरण और गहरा होता है।

इससे पहले आर्टिकल 370 और द केरल स्टोरी जैसी फिल्मों को लेकर भी इसी तरह की बहस सामने आ चुकी है। इन फिल्मों को लेकर जहां सत्ता पक्ष से सराहना मिली, वहीं आलोचकों ने इन्हें प्रचारात्मक और तथ्यात्मक रूप से भ्रामक बताया।

धुरंधर के मामले में भी कुछ आलोचकों को फिल्म पर सवाल उठाने के बाद सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग और ऑनलाइन उत्पीड़न का सामना करना पड़ा है। इसे भारत में राजनीतिक विषयों पर बनने वाली फिल्मों के इर्द-गिर्द बढ़ते ध्रुवीकरण के रूप में देखा जा रहा है।

फिल्म में पाकिस्तान और बलूचिस्तान से जुड़ी घटनाओं के चित्रण को लेकर बलूच समुदाय में नाराजगी सामने आई है। बलूच समुदाय के कार्यकर्ता मीर यार बलूच ने फिल्म के कंटेंट पर कड़ा एतराज जताते हुए इसे बलूच समाज की छवि को नुकसान पहुंचाने वाला बताया है।

मीर यार बलूच ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर अपनी आपत्ति दर्ज कराते हुए लिखा कि फिल्म में बलूच लोगों को भारत-विरोधी गतिविधियों से जुड़ा हुआ दिखाया गया है, जो पूरी तरह गलत और भ्रामक है। उन्होंने स्पष्ट किया कि बलूच समुदाय ने कभी भी किसी आतंकी घटना, विशेष रूप से 26/11 जैसे हमलों, का समर्थन नहीं किया है।

उन्होंने कहा कि वास्तविकता यह है कि बलूच समुदाय खुद पाकिस्तान प्रायोजित हिंसा, दमन और अत्याचार का लंबे समय से शिकार रहा है। ऐसे में फिल्म के जरिए उन्हें आतंक या भारत-विरोधी गतिविधियों से जोड़ना ऐतिहासिक और सामाजिक सच्चाई के विपरीत है।

बलूच कार्यकर्ता का कहना है कि फिल्म में दिखाए गए कई दृश्य बलूच पहचान, संस्कृति और संघर्ष से बिल्कुल मेल नहीं खाते। उन्होंने आरोप लगाया कि इस तरह का चित्रण न केवल गलत धारणा बनाता है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बलूच समुदाय की साख को भी प्रभावित करता है।

मीर यार बलूच ने फिल्म निर्माताओं से आग्रह किया है कि वे तथ्यों के साथ जिम्मेदारीपूर्ण प्रस्तुति करें और किसी भी समुदाय को गलत संदर्भ में पेश करने से बचें