जाट आरक्षण आंदोलन के ह*त्याकांड में दलजीत सिहाग बरी, 3 गवाह मुकरने पर हाईकोर्ट का फैसला

जाट आरक्षण आंदोलन के ढाणी पाल हत्याकांड में हाईकोर्ट ने दलजीत सिहाग समेत सभी अपीलकर्ताओं को बरी किया। तीन गवाह मुकरने और हथियार जोड़ने में देरी पर उठे सवाल।

जाट आरक्षण आंदोलन के ह*त्याकांड में दलजीत सिहाग बरी, 3 गवाह मुकरने पर हाईकोर्ट का फैसला

जाट आरक्षण आंदोलन के हत्या मामले में दलजीत सिहाग समेत सभी आरोपी बरी

➤ तीनों मुख्य गवाह अदालत में मुकर गए, मृतक के चचेरे भाई ने पुलिस पर सादे कागजों पर हस्ताक्षर कराने का आरोप लगाया

➤ हाईकोर्ट ने हथियार की बरामदगी में करीब दो साल की देरी और सबूतों पर सवाल उठाते हुए उम्रकैद की सजा रद्द की

पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने 2016 के जाट आरक्षण आंदोलन के दौरान हिसार के हांसी क्षेत्र के ढाणी पाल में हुई हत्या के मामले में मुख्य आरोपी दलजीत सिहाग समेत अन्य आरोपियों को बरी कर दिया है। अभियोजन पक्ष के तीनों मुख्य गवाह अदालत में आरोपियों की पहचान करने से मुकर गए थे। इनमें मृतक मिंटू का चचेरा भाई और मामले का शिकायतकर्ता राम अवतार भी शामिल था। उसने अदालत में कहा कि वह घटनास्थल पर मौजूद नहीं था और उसने घटना को अपनी आंखों से नहीं देखा। साथ ही उसने पुलिस पर सादे कागजों पर हस्ताक्षर करवाने का आरोप लगाया।

हाईकोर्ट की जस्टिस राजेश भारद्वाज और जस्टिस पूजा चोपड़ा की बेंच ने मामले में पेश किए गए सबूतों, गवाहों के बयानों और हथियार को घटना से जोड़ने की प्रक्रिया पर सवाल उठाए। अदालत ने पाया कि मुख्य गवाहों के आरोपियों की पहचान करने से इनकार करने के बाद पुलिस ने करीब दो साल की देरी से एक दूसरे मामले में बरामद कट्टे को इस केस से जोड़ा और सप्लीमेंट्री चालान पेश किया। अदालत ने सबूतों की कमियों और हथियार को जोड़ने में हुई देरी को ध्यान में रखते हुए निचली अदालत का 2019 का फैसला रद्द कर दिया और सभी अपीलकर्ताओं को बरी कर दिया।

दलजीत सिहाग गुरुवार रात को झज्जर जेल से रिहा हो गया। जेल से बाहर आने के बाद उसके दोस्तों और समाज के लोगों ने उसका स्वागत किया।

22 फरवरी 2016 को ढाणी पाल में भीड़ ने किया था हमला, गोली लगने से मिंटू की मौत

यह मामला 22 फरवरी 2016 का है, जब जाट आरक्षण आंदोलन के दौरान हांसी के ढाणी पाल में 70-75 लोगों की भीड़ ने हमला किया था। इस दौरान हुई गोलीबारी में मिंटू की मौत हो गई थी, जबकि कृष्ण और हरफूल घायल हुए थे।

पुलिस ने इस मामले में दलजीत उर्फ दलजीत, पवन उर्फ पोना और सुरेंद्र उर्फ झंडा को गिरफ्तार किया था। मुकदमे की सुनवाई के बाद ट्रायल कोर्ट ने वर्ष 2019 में तीनों को उम्रकैद की सजा सुनाई थी। इसके बाद मामला हाईकोर्ट पहुंचा, जहां आरोपियों की ओर से सजा को चुनौती दी गई।

अपीलों पर सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष के तीन प्रमुख गवाह अपने पहले के बयानों से मुकर गए। इसके बाद मामले में हथियार की बरामदगी, फॉरेंसिक रिपोर्ट और पुलिस की जांच प्रक्रिया को लेकर बचाव पक्ष ने सवाल उठाए।

अदालत में तीनों मुख्य गवाहों ने आरोपियों की पहचान करने से किया इनकार

मामले में अभियोजन पक्ष के लिए सबसे अहम घटनाक्रम तब सामने आया, जब तीनों मुख्य गवाहों ने अदालत में आरोपियों की पहचान करने से इनकार कर दिया। इनमें दो घायल गवाह और मृतक का चचेरा भाई शामिल था।

1. कृष्ण ने कहा- कटघरे में मौजूद आरोपी हमलावर नहीं थे

घायल गवाह कृष्ण ने अदालत में बताया कि वर्ष 2016 में 5,000 से 6,000 लोगों की भीड़ ने हमला किया था। हालांकि, उसने अदालत में मौजूद आरोपियों की पहचान हमलावरों के रूप में नहीं की।

कृष्ण ने स्पष्ट कहा कि कटघरे में खड़े लोग वे नहीं थे, जिन्होंने उस पर या अन्य लोगों पर हमला किया था। उसने पुलिस को दिए गए अपने पहले के बयान से भी इनकार कर दिया। इस तरह अभियोजन पक्ष को उससे आरोपियों की पहचान के संबंध में समर्थन नहीं मिला।

2. हरफूल सिंह ने घटना बताई, लेकिन आरोपियों को पहचानने से मुकर गए

दूसरे घायल गवाह हरफूल सिंह ने अदालत में घटना का विवरण तो दिया, लेकिन आरोपियों की पहचान करने से इनकार कर दिया। उसने कहा कि कटघरे में खड़े आरोपी वे उपद्रवी नहीं थे, जिन्होंने घटना को अंजाम दिया था।

हरफूल सिंह ने भी पुलिस को दिए गए अपने बयान की पुष्टि नहीं की। ऐसे में अभियोजन पक्ष के दोनों घायल गवाह आरोपियों की पहचान के मामले में अपने पहले के बयानों का समर्थन नहीं कर पाए।

3. राम अवतार ने कहा- घटनास्थल पर मौजूद नहीं था

मृतक मिंटू का चचेरा भाई और मामले का शिकायतकर्ता राम अवतार भी अदालत में अपने बयान से मुकर गया। उसने कहा कि वह खुद घटनास्थल पर मौजूद नहीं था और उसने घटना को नहीं देखा था।

राम अवतार ने आरोपियों पर हमला करने या गोलीबारी करने का आरोप लगाने से इनकार कर दिया। साथ ही उसने पुलिस पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि उससे सादे कागजों पर हस्ताक्षर करवाए गए थे। उसके बयान से भी अभियोजन पक्ष को आरोपियों की पहचान के संबंध में अपेक्षित समर्थन नहीं मिला।

गवाहों के मुकरने के करीब दो साल बाद दूसरे केस का हथियार जोड़ा

मुख्य गवाहों के अदालत में आरोपियों की पहचान करने से इनकार करने के बाद पुलिस ने एक अन्य एफआईआर नंबर 337 में बरामद कट्टे को इस मामले से जोड़ दिया। यह कार्रवाई घटना के करीब दो साल बाद की गई थी। इसके बाद पुलिस ने सप्लीमेंट्री चालान पेश किया।

हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान हथियार को दूसरे मामले से जोड़ने में हुई देरी और इस प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सवाल उठे। बचाव पक्ष ने भी दलील दी कि जब अभियोजन पक्ष के मुख्य गवाह आरोपियों की पहचान नहीं कर रहे थे, तब पुलिस ने करीब दो साल बाद दूसरे मामले में जब्त हथियार को इस केस से जोड़कर मुकदमे को आगे बढ़ाया।

अदालत ने हथियार को मामले से जोड़ने में हुई देरी पर गौर किया। उसने यह भी देखा कि इस देरी का कोई संतोषजनक कारण नहीं बताया गया था। इसके अलावा, हथियार की बरामदगी और एफएसएल रिपोर्ट को लेकर उठाए गए सवालों पर भी विचार किया गया।

आरोपियों के वकील प्रदीप सिंह पूनिया ने एफएसएल रिपोर्ट पर उठाए सवाल

आरोपियों की ओर से एडवोकेट प्रदीप सिंह पूनिया ने हाईकोर्ट में दलील दी कि अभियोजन पक्ष का मामला विश्वसनीय सबूतों पर आधारित नहीं था। उन्होंने कहा कि तीनों मुख्य गवाहों के मुकरने के बाद पुलिस ने करीब दो साल की देरी से दूसरी एफआईआर में जब्त कट्टे को इस मामले से जोड़ दिया।

बचाव पक्ष ने हथियार की बरामदगी से संबंधित परिस्थितियों पर भी सवाल उठाए। वकील ने बताया कि जिस बलवंत उर्फ बल्लू से हथियार बरामद दिखाया गया था, उसके खुलासे में हथियार सोनू गुर्जर से खरीदने की बात दर्ज थी।

एडवोकेट प्रदीप सिंह पूनिया ने एफएसएल रिपोर्ट पर सवाल उठाते हुए कहा कि हथियार को करीब दो साल की देरी से लैब भेजा गया था और उसे सील किए गए पार्सल में नहीं भेजा गया था। बचाव पक्ष के अनुसार, ऐसी परिस्थितियों में केवल हथियार की बरामदगी और एफएसएल रिपोर्ट के आधार पर दोषसिद्धि को कायम नहीं रखा जा सकता।

राज्य सरकार ने कहा- गवाहों के मुकरने से पूरी गवाही खारिज नहीं होती

राज्य सरकार की ओर से डिप्टी एडवोकेट जनरल श्वेता सांघी ने आरोपियों की सजा बरकरार रखने की मांग की। उन्होंने दलील दी कि चश्मदीद गवाहों के मुकरने के बावजूद उनकी गवाही को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता।

राज्य सरकार ने एफएसएल रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि मृतक के शरीर से मिली गोली आरोपी दलजीत के पास से बरामद हथियार से चली थी। इसी आधार पर सरकार की ओर से निचली अदालत के फैसले को सही ठहराते हुए उम्रकैद की सजा बरकरार रखने की मांग की गई।

हालांकि, हाईकोर्ट ने अभियोजन पक्ष के सबूतों और बचाव पक्ष की दलीलों का मूल्यांकन करते हुए मामले में दोषसिद्धि को कायम रखने के लिए पर्याप्त ठोस आधार नहीं पाया।

हाईकोर्ट ने कहा- संदेह से परे अपराध साबित करना अभियोजन पक्ष की जिम्मेदारी

जस्टिस राजेश भारद्वाज और जस्टिस पूजा चोपड़ा की बेंच ने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष को आरोपियों के खिलाफ अपना मामला संदेह से परे साबित करना होता है। जब घायल और चश्मदीद गवाह आरोपियों की पहचान करने से मुकर गए, तो केवल पुलिस हिरासत में दिए गए बयानों और संदेहास्पद हथियार बरामदगी के आधार पर दोषसिद्धि कायम नहीं रखी जा सकती।

अदालत ने हथियार को घटना से जोड़ने में हुई देरी पर भी सवाल उठाए। घटना के करीब दो साल बाद दूसरे मामले में बरामद हथियार को इस केस से जोड़कर सप्लीमेंट्री चालान पेश किया गया था, लेकिन इस देरी का कोई संतोषजनक कारण नहीं बताया गया।

हाईकोर्ट ने कहा कि केवल संदेहास्पद एफएसएल रिपोर्ट और पुलिस हिरासत में दिए गए बयानों के आधार पर आरोपियों को दोषी ठहराने का फैसला कायम नहीं रखा जा सकता। मामले में ठोस सबूतों की कमी और गंभीर संदेह को देखते हुए अदालत ने आरोपियों को संदेह का लाभ दिया।

2019 में मिली उम्रकैद की सजा रद्द, दलजीत सिहाग झज्जर जेल से रिहा

हाईकोर्ट ने सबूतों का पुनर्मूल्यांकन करने के बाद ट्रायल कोर्ट के वर्ष 2019 के फैसले को रद्द कर दिया। इसके साथ ही दलजीत सिहाग समेत सभी अपीलकर्ताओं को बरी कर दिया गया।

गुरुवार रात को दलजीत झज्जर जेल से बाहर आया। जेल से रिहाई के बाद उसके दोस्तों और समाज के लोगों ने उसका स्वागत किया। यह फैसला 2016 के जाट आरक्षण आंदोलन के दौरान ढाणी पाल में हुई हत्या के मामले में आया है, जिसमें ट्रायल कोर्ट ने तीन आरोपियों को उम्रकैद की सजा सुनाई थी।