एशियन गेम्स में हरियाणा का जलवा, किरण पहल ने रिले में जीता गोल्ड

एशियन गेम्स 2026 में भारत ने 85 पदक जीते, जिनमें 37 हरियाणवी खिलाड़ी शामिल हैं। सोनीपत की किरण पहल ने 4×400 मीटर रिले में गोल्ड जीता।

एशियन गेम्स 2026 में भारत ने जीते 85 पदक, 37 पदक विजेता हरियाणा से
➤ सोनीपत की किरण पहल ने 4×400 मीटर रिले में जीता गोल्ड, गांव गुमड़ में होगा भव्य स्वागत
➤ स्टेडियम की फीस और खर्च के लिए 4 हजार की नौकरी से लेकर रेलवे तक, संघर्षों से बनीं गोल्डन गर्ल

जापान के आइची-नागोया में हुए एशियन गेम्स 2026 में भारतीय खिलाड़ियों का अभियान पूरा हो गया है। भारत ने प्रतियोगिता में 21 गोल्ड मेडल सहित 85 पदक जीते हैं। इन पदक विजेता खिलाड़ियों में 37 खिलाड़ी हरियाणा के हैं। हालांकि, पदक जीतने वाले खिलाड़ियों की संख्या में एक ही खेल की टीम में शामिल कई खिलाड़ी भी शामिल हैं।

इन खिलाड़ियों में सोनीपत के गुमड़ गांव की एथलीट किरण पहल भी शामिल हैं। किरण ने 4×400 मीटर रिले में गोल्ड मेडल जीतकर देश और प्रदेश का नाम रोशन किया है। इससे पहले भारतीय पुरुष कबड्डी टीम ने भी गोल्ड मेडल जीता, जिसमें हरियाणा के 8 खिलाड़ी शामिल रहे। किरण पहल अब अपने पैतृक गांव गुमड़ पहुंचेंगी, जहां उनके स्वागत की तैयारियां की गई हैं।

गांव पहुंचने पर होगा किरण पहल का भव्य अभिनंदन

एथलीट किरण पहल के गांव पहुंचने पर स्वागत समारोह आयोजित किया जाएगा। किरण पहले जीटी रोड स्थित बस स्टैंड, गन्नौर पहुंचेंगी। इसके बाद बस स्टैंड से गांव गुमड़ स्थित ग्राम सचिवालय तक स्वागत यात्रा निकाली जाएगी।

गुमड़ के ग्राम सचिवालय में भी किरण पहल के सम्मान में समारोह आयोजित होगा। ग्रामीण अपनी बेटी की इस ऐतिहासिक उपलब्धि पर उनका स्वागत कर हौसला बढ़ाएंगे। एशियन गेम्स में गोल्ड मेडल जीतने के बाद किरण के परिवार में भी खुशी का माहौल है। परिवार ने मिठाई बांटकर जश्न मनाया और किरण ने वीडियो कॉल के जरिए भी परिजनों से बातचीत की।

तीसरी कक्षा में खेल देखकर जागा जुनून, पांचवीं में मैदान पर उतरीं

सोनीपत के गुमड़ गांव की रहने वाली किरण पहल ने बहुत कम उम्र में खेलों की ओर कदम बढ़ाया था। तीसरी कक्षा में उन्होंने कुछ लड़कियों को जिम्नास्टिक करते देखा। इसके बाद उनके मन में भी खेलों में जाने की इच्छा पैदा हुई।

पांचवीं कक्षा में उन्होंने पहली बार स्कूल की प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया। साइकिल रेस, मटका रेस, रस्सी और दौड़ जैसी प्रतियोगिताओं में उन्होंने लगातार जीत हासिल की। यहीं से उनके खेल का सफर आगे बढ़ा। पहली बार उन्हें 500 रुपए का इनाम मिला, जिसने उनके उत्साह को और बढ़ाया।

झूठी बात के कारण पांच महीने बंद रही प्रैक्टिस

किरण के खेल सफर में एक समय ऐसा भी आया, जब परिवार ने उनकी प्रैक्टिस तक रोक दी थी। 2009 में उन्होंने स्कूल ग्राउंड में रेस की प्रैक्टिस शुरू की थी। एक दिन गांव के किसी व्यक्ति ने उन्हें एक लड़के से बात करते देख लिया।

उस व्यक्ति ने परिवार से कहा कि किरण प्रैक्टिस के बहाने लड़कों से मिलने जाती हैं। इस बात के बाद परिवार ने उनकी प्रैक्टिस बंद करवा दी। करीब पांच महीने तक किरण मैदान से दूर रहीं।

बाद में उन्होंने परिवार को भरोसा दिलाया कि उनका पूरा ध्यान खेल पर है। इसके बाद दादी और परिवार ने उन्हें दोबारा प्रैक्टिस करने की अनुमति दी। इसके बाद किरण ने फिर मैदान का रुख किया और अपने लक्ष्य की ओर बढ़ती चली गईं।

दो किलोमीटर पैदल जाकर घास के मैदान में करती थीं अभ्यास

2010 में किरण गांव से करीब दो किमी दूर बीएसटी स्कूल के मैदान में प्रैक्टिस करने जाती थीं। उस समय उनके पास सिंथेटिक ट्रैक की सुविधा नहीं थी। वह घास के मैदान में ही दौड़ने का अभ्यास करती थीं।

परिवार की आर्थिक स्थिति भी सामान्य थी। उनके पिता ओमप्रकाश कोर्ट में मुंशी थे। ऐसे में खेल के लिए अलग से महंगी डाइट जुटाना भी आसान नहीं था। घर का घी, दूध और रोटी ही उनकी डाइट का मुख्य सहारा रहे।

करीब 18 महीने तक पैदल मैदान आने-जाने के बाद परिवार ने 2012 में उनके लिए 300 रुपए में पुरानी साइकिल खरीदी। साइकिल को रिपेयर कराने के बाद किरण रोज उसी से मैदान पहुंचने लगीं। इस छोटी सी मदद ने उनके लिए मैदान तक पहुंचना थोड़ा आसान कर दिया।

स्टेडियम की फीस जुटाने के लिए करनी पड़ी नौकरी

किरण ने 2014 में सोनीपत के सुभाष स्टेडियम में प्रैक्टिस शुरू की। बेहतर ट्रेनिंग के लिए वह 2015 में रोहतक चली गईं। वहां रहने और खाने का खर्च निकालना उनके लिए बड़ी चुनौती थी।

खर्च पूरा करने के लिए उन्हें पतंजलि स्टोर में नौकरी करनी पड़ी। उन्हें हर महीने 4 हजार रुपए मिलते थे। उनकी दिनचर्या बेहद कठिन थी। सुबह प्रैक्टिस करने के बाद दिन में नौकरी करती थीं और शाम को फिर मैदान पर जाकर अभ्यास करती थीं।

खेल के प्रति उनका जुनून इतना मजबूत था कि नौकरी और अभ्यास दोनों को साथ लेकर चलती रहीं। आर्थिक मुश्किलों के बावजूद उन्होंने अपने खेल को रुकने नहीं दिया।

रेलवे की नौकरी के लिए दोबारा शुरू की पढ़ाई

किरण ने जिला और राज्य स्तर की प्रतियोगिताओं में लगातार मेडल जीतने शुरू कर दिए। 2018 में पहली बार नेशनल चैंपियनशिप में लगातार दो गोल्ड मेडल हासिल किए। इसके बाद उन्हें रेलवे में नौकरी का मौका मिला, लेकिन उनकी पढ़ाई इसमें बाधा बन गई।

दसवीं पास नहीं होने के कारण नौकरी में अड़चन आई। दसवीं में कंपार्टमेंट आने के बाद उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी थी। नौकरी हासिल करने के लिए उन्होंने दोबारा पढ़ाई शुरू की और 2019 में दसवीं पास की।

यह उनके जीवन का एक और महत्वपूर्ण मोड़ था। खेल के साथ पढ़ाई पूरी करने के बाद उनके लिए रोजगार का रास्ता भी खुला।

2019 में इंडिया कैंप पहुंचीं, कोविड ने रोका सफर

दसवीं पास करने के बाद 2019 में किरण को पटियाला के इंडिया कैंप के लिए बुलाया गया। वह लगातार आगे बढ़ रही थीं, लेकिन 2020 में कोविड के कारण खेल गतिविधियां प्रभावित हो गईं।

उन्होंने ओलिंपिक के लिए ट्रायल दिया, लेकिन चयन नहीं हो पाया। इसके बाद उन्हें कैंप छोड़कर वापस लौटना पड़ा। मुश्किलों के बावजूद उन्होंने खेल छोड़ने का फैसला नहीं किया।

25 जून 2021 को रेलवे पटियाला में जूनियर क्लर्क के पद पर ज्वाइन किया। इसके बाद नौकरी के साथ ही खेलों की तैयारी भी जारी रखी।

पेरिस ओलिंपिक में पहुंचीं, लेकिन पदक से रह गईं दूर

किरण पहल ने 2024 पेरिस ओलिंपिक में भी हिस्सा लिया, लेकिन वहां वह पदक जीतने में सफल नहीं हो सकीं। इससे पहले 2023 में भारतीय ओपन चैंपियनशिप में वह तीसरे स्थान पर रही थीं।

एशियन गेम्स 2026 में भी उनकी चुनौती आसान नहीं थी। 400 मीटर की व्यक्तिगत स्पर्धा में वह महज 20 माइक्रो सेकंड से पदक से चूक गईं। इस प्रदर्शन के बाद परिवार निराश था।

रिले स्पर्धा से पहले उनकी मां इतनी दुखी थीं कि घर में खाना तक नहीं बना। लेकिन किरण ने इस निराशा को खुद पर हावी नहीं होने दिया। उन्होंने अगली स्पर्धा में शानदार वापसी की और 4×400 मीटर रिले में गोल्ड मेडल जीत लिया।

एक समय खेल की प्रैक्टिस के लिए दो किलोमीटर पैदल जाने वाली, 300 रुपए की पुरानी साइकिल से मैदान पहुंचने वाली और खर्च चलाने के लिए 4 हजार रुपए महीने की नौकरी करने वाली किरण आज एशियन गेम्स की गोल्ड मेडलिस्ट हैं। उनकी कहानी सिर्फ पदक जीतने की नहीं, बल्कि लगातार संघर्ष करते हुए अपने सपने को पूरा करने की कहानी है।

गांव की बेटी के लौटने का इंतजार

एशियन गेम्स में गोल्ड मेडल जीतने के बाद अब गुमड़ गांव को अपनी बेटी के लौटने का इंतजार है। गांव में उनके सम्मान की तैयारियां हैं। ग्राम सचिवालय में आयोजित समारोह में ग्रामीण किरण पहल का अभिनंदन करेंगे।

किरण की उपलब्धि ने एक बार फिर यह दिखाया है कि सीमित संसाधन और मुश्किल परिस्थितियां किसी खिलाड़ी के सपने को रोक नहीं सकतीं, अगर लक्ष्य के प्रति मेहनत और हौसला कायम रहे।