40 साल बाद रावी-व्यास विवाद पर बड़ी पहल, झज्जर पहुंचेगी जांच कमेटी

रावी-व्यास जल विवाद को लेकर 18 अप्रैल को झज्जर में ट्रिब्यूनल कमेटी का दौरा होगा। टीम जमीनी हालात का अध्ययन कर पानी बंटवारे पर रिपोर्ट तैयार करेगी, जिससे हरियाणा को अपने अधिकार के लिए मजबूती मिल सकती है।

40 साल बाद रावी-व्यास विवाद पर बड़ी पहल, झज्जर पहुंचेगी जांच कमेटी

18 अप्रैल को झज्जर पहुंचेगी रावी-व्यास जांच कमेटी
पानी के बंटवारे को लेकर ग्राउंड रिपोर्ट तैयार होगी
सुप्रीम कोर्ट-हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज भी रहेंगे शामिल

हरियाणा के जल अधिकारों से जुड़े लंबे समय से लंबित रावी-व्यास विवाद में अब अहम हलचल तेज होती नजर आ रही है। 18 अप्रैल को रावी-व्यास ट्रिब्यूनल बोर्ड की उच्चस्तरीय कमेटी झज्जर जिले के दौरे पर पहुंचेगी। यह दौरा महज औपचारिक निरीक्षण नहीं होगा, बल्कि जमीनी सच्चाई को समझने और पानी के बंटवारे को लेकर ठोस आधार तैयार करने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। करीब 40 साल बाद इस स्तर पर फील्ड विजिट होने जा रही है, जिससे हरियाणा के लिए इस दौरे का महत्व और भी बढ़ गया है।

कमेटी इस दौरान साल्हावास स्थित पंप हाउस और आसपास के सिंचाई क्षेत्रों का बारीकी से निरीक्षण करेगी। नहरों की मौजूदा स्थिति, पानी की उपलब्धता, वितरण प्रणाली और किसानों तक पहुंचने वाले पानी की वास्तविकता का आंकलन किया जाएगा। इस निरीक्षण का मुख्य उद्देश्य हरियाणा को भाखड़ा डैम से मिलने वाले पानी की वास्तविक जरूरत को समझना और उसके आधार पर एक विस्तृत व तथ्यात्मक रिपोर्ट तैयार करना है। यह रिपोर्ट भविष्य में पानी के बंटवारे और उससे जुड़े कानूनी निर्णयों के लिए अहम दस्तावेज साबित हो सकती है।

इस निरीक्षण में सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के रिटायर्ड व मौजूदा जजों के साथ हरियाणा सिंचाई विभाग के वरिष्ठ अधिकारी और जिला प्रशासन के अधिकारी भी शामिल होंगे। विभागीय मंत्री श्रुति चौधरी भी मौके पर मौजूद रहकर पूरे निरीक्षण की निगरानी करेंगी।

झज्जर जिले के अकेहड़ी मदनपुर गांव में स्थित साल्हावास पंप हाउस इस दौरे का केंद्र बिंदु रहेगा। इसे एशिया का दूसरा सबसे बड़ा पानी लिफ्टिंग पंप हाउस माना जाता है, जो दक्षिण हरियाणा के जल प्रबंधन की रीढ़ है। यह परियोजना न केवल हजारों किसानों के लिए सिंचाई का प्रमुख स्रोत है, बल्कि गुरुग्राम, महेंद्रगढ़ और नारनौल जैसे क्षेत्रों में पेयजल आपूर्ति में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

इस पंप हाउस की शुरुआत वर्ष 1939 में एक छोटे नाले के रूप में हुई थी, जो समय के साथ विस्तार पाकर आज भाखड़ा नहर प्रणाली का अहम हिस्सा बन चुका है। सरकार ने इसके आधुनिकीकरण पर 127 करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए हैं और 2018 में यहां लगी मोटरों का नवीनीकरण किया गया, जिससे इसकी क्षमता में बड़ा इजाफा हुआ। वर्तमान में यहां से 3100 क्यूसेक से अधिक पानी लिफ्ट कर दूर-दराज के इलाकों तक पहुंचाया जा रहा है।

रावी-व्यास जल विवाद की जड़ें 1966 में पंजाब के पुनर्गठन के बाद शुरू हुई थीं। पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के बीच पानी के बंटवारे को लेकर यह विवाद आज तक पूरी तरह सुलझ नहीं पाया है। इसका मुख्य केंद्र सतलुज-यमुना लिंक (SYL) नहर रहा है। जहां पंजाब अतिरिक्त पानी न होने का दावा करता रहा है, वहीं हरियाणा 1981 के समझौते के आधार पर अपने हिस्से की मांग करता आया है।

इस विवाद को सुलझाने के लिए 1986 में ट्रिब्यूनल का गठन किया गया था और 1987 में रिपोर्ट भी सौंप दी गई थी, लेकिन आज तक उस पर पूरी तरह अमल नहीं हो पाया। हाल ही में केंद्र सरकार ने ट्रिब्यूनल की समयसीमा 5 अगस्त 2026 तक बढ़ा दी है, जिससे इस मुद्दे पर एक बार फिर सक्रियता बढ़ी है।

यह पहली बार है जब ट्रिब्यूनल से जुड़ी कमेटी झज्जर जिले का दौरा कर रही है। निरीक्षण के दौरान साल्हावास के JF-2 पंप हाउस के साथ-साथ सासरौली गांव के सिंचाई क्षेत्र का भी दौरा किया जाएगा, ताकि जमीनी हकीकत को समझा जा सके।

स्पष्ट है कि 40 साल बाद हो रही यह पहल हरियाणा के जल भविष्य के लिए निर्णायक साबित हो सकती है। कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर राज्य को पानी के बंटवारे में मजबूती मिल सकती है और दक्षिण हरियाणा के किसानों को लंबे समय से चली आ रही पानी की समस्या से राहत मिलने की उम्मीद जगी है।