त्योहारों से पहले सस्ती होंगी दालें! जानें वजह
त्योहारों से पहले दालों की कीमतें नियंत्रित करने के लिए मसूर और पीली मटर के आयात शुल्क में कटौती पर विचार हो रहा है, जबकि अरहर-उड़द शुल्क मुक्त हैं।
➤ मसूर और पीली मटर के आयात शुल्क में कटौती पर विचार
➤ अरहर और उड़द मार्च 2027 तक शुल्क मुक्त, चने को छूट से बाहर रखने की संभावना
➤ कम बारिश और त्योहारों में बढ़ती मांग के बीच दालों की कीमतों पर दबाव
देश में बढ़ती महंगाई के बीच दालों की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए सरकार आयात शुल्क में कटौती पर विचार कर रही है। त्योहारों के मौसम से पहले दालों की सप्लाई बढ़ाने और कीमतों पर लगाम लगाने के लिए कुछ दालों के आयात पर लगने वाला टैक्स कम किया जा सकता है। हालांकि, सरकार की ओर से अभी इस संबंध में कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है। फिलहाल दालों की उपलब्धता बढ़ाने और बाजार में कीमतों का दबाव कम करने के उद्देश्य से आयात शुल्क में संभावित बदलाव पर विचार किया जा रहा है।
देश में रोजमर्रा के खाने में इस्तेमाल होने वाली दालों की कीमतों में बढ़ोतरी से आम लोगों पर खर्च का दबाव बढ़ा है। इसी को देखते हुए सरकार की ओर से दालों की आपूर्ति बढ़ाने के विकल्पों पर विचार किया जा रहा है। अगर आयात शुल्क में कटौती होती है, तो विदेश से दालों का आयात अपेक्षाकृत आसान हो सकता है और बाजार में उपलब्धता बढ़ने से कीमतों को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है।
किन दालों पर घट सकता है आयात शुल्क?
संभावित बदलाव में मसूर दाल और पीली मटर को राहत मिल सकती है। हालांकि, चना को इस संभावित छूट से बाहर रखा जा सकता है। फिलहाल भारत में मसूर और चने के आयात पर 10 प्रतिशत टैक्स है, जबकि पीली मटर पर 30 प्रतिशत आयात शुल्क लगाया जाता है।
वहीं अरहर और उड़द के आयात को मार्च 2027 तक शुल्क मुक्त किया गया है। ऐसे में इन दोनों दालों के लिए पहले से लागू शुल्क मुक्त व्यवस्था जारी है, जबकि मसूर और पीली मटर के मामले में आयात शुल्क कम करने पर विचार किया जा रहा है।
कम बारिश से दालों के उत्पादन पर असर की आशंका
आयात शुल्क में संभावित कटौती की जरूरत के पीछे इस साल का मानसून भी एक अहम कारण माना जा रहा है। इस साल मानसून सामान्य नहीं रहा है और इससे देश में दालों के उत्पादन पर असर पड़ने की आशंका है। दालों की खेती का एक बड़ा हिस्सा बारिश पर निर्भर रहता है।
इस साल जून से सितंबर के बीच देश के प्रमुख दाल उत्पादक राज्यों में सामान्य से 30 प्रतिशत तक कम बारिश हुई है। कम बारिश के कारण दालों की फसल पर असर पड़ने की आशंका है। ऐसे में घरेलू उत्पादन कम रहने की स्थिति में आयात के जरिए बाजार में दालों की उपलब्धता बनाए रखना जरूरी हो सकता है।
त्योहारों के मौसम में बढ़ जाती है दालों की मांग
भारत में त्योहारों के दौरान खाने-पीने की चीजों की मांग सामान्य दिनों की तुलना में बढ़ जाती है। दालों की मांग में भी इस दौरान तेजी आती है। खासकर चना की मांग ज्यादा रहती है, क्योंकि घरों के अलावा मिल और खाद्य कंपनियां भी त्योहारों से पहले स्टॉक जमा करती हैं।
बढ़ती मांग के बीच अगर घरेलू उत्पादन पर भी दबाव रहता है, तो बाजार में कीमतों पर असर पड़ सकता है। इसी वजह से सरकार दालों की आपूर्ति और आयात शुल्क से जुड़े विकल्पों पर विचार कर रही है।
खाने-पीने की चीजों की महंगाई भी बढ़ी
देश में खाने-पीने की चीजों की महंगाई का दबाव भी बना हुआ है। अगस्त में खाने-पीने की चीजों की महंगाई 5.95 प्रतिशत रही। दालों की कीमतों में भी सालाना आधार पर बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
अगस्त में अरहर की कीमतों में सालाना आधार पर 5.6 प्रतिशत और उड़द की कीमतों में 7.4 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई। ऐसे में त्योहारों से पहले दालों की बढ़ती मांग और संभावित कम उत्पादन के बीच कीमतों को नियंत्रित रखना सरकार के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
फिलहाल सरकार की ओर से आयात शुल्क में कटौती को लेकर कोई अंतिम घोषणा नहीं की गई है। संभावित फैसले में मसूर और पीली मटर को लेकर राहत पर विचार किया जा रहा है, जबकि चने को इस छूट से बाहर रखा जा सकता है। वहीं अरहर और उड़द के लिए मार्च 2027 तक शुल्क मुक्त आयात की व्यवस्था लागू है।
अगर आयात शुल्क में कटौती का फैसला होता है, तो इसका उद्देश्य दालों की आपूर्ति बढ़ाना और कीमतों के दबाव को कम करना होगा। त्योहारों के मौसम में मांग बढ़ने और घरेलू उत्पादन को लेकर बनी आशंकाओं के बीच सरकार के संभावित फैसले पर अब नजर बनी हुई है।
Akhil Mahajan