हरियाणा की तीरंदाज कीर्ति शर्मा की गोल्डन कहानी: पिता ने ₹60 हजार कर्ज लेकर खरीदा धनुष, बेटी ने एशियन गेम्स में रचा इतिहास

जींद की तीरंदाज कीर्ति शर्मा ने एशियन गेम्स में महिला रिकर्व टीम का गोल्ड जीता। पिता ने कर्ज लेकर धनुष खरीदा और बेटी ने मेहनत से सपना पूरा किया।

हरियाणा की तीरंदाज कीर्ति शर्मा की गोल्डन कहानी: पिता ने ₹60 हजार कर्ज लेकर खरीदा धनुष, बेटी ने एशियन गेम्स में रचा इतिहास

➤ पिता ने आढ़ती से ₹60 हजार कर्ज लेकर बेटी के लिए खरीदा धनुष
➤ 15 साल की उम्र में शुरू की तीरंदाजी, अब एशियन गेम्स में जीता गोल्ड
➤ कोच उधम सिंह की ट्रेनिंग और परिवार के त्याग से कीर्ति ने हासिल की बड़ी कामयाबी


जींद। खेत में धान की कटाई चल रही थी और घर की आर्थिक स्थिति भी ऐसी नहीं थी कि खेल पर बड़ी रकम खर्च की जा सके। लेकिन बेटी की आंखों में तीरंदाजी के सपने थे और पिता विजय शर्मा ने उन सपनों के आगे अपनी परेशानियों को नहीं आने दिया। जरूरत पड़ी तो पहले स्कूल से महज 5 हजार रुपये में पुराना धनुष खरीदा और बाद में जब बड़े स्तर पर मुकाबलों के लिए नए धनुष की जरूरत पड़ी तो आढ़ती से 60 हजार रुपये कर्ज लेकर पटियाला से धनुष खरीदकर बेटी को दिया। अब उसी बेटी कीर्ति शर्मा ने एशियन गेम्स में भारत के लिए स्वर्ण पदक जीतकर परिवार के उस संघर्ष को यादगार बना दिया है।

जापान में आयोजित एशियन गेम्स में जींद जिले के रिटौली गांव की 20 वर्षीय तीरंदाज कीर्ति शर्मा ने महिला रिकर्व टीम स्पर्धा में शानदार प्रदर्शन किया। भारतीय टीम ने फाइनल मुकाबले में दक्षिण कोरिया को 5-3 से हराकर स्वर्ण पदक अपने नाम किया। इस जीत में कीर्ति शर्मा की भूमिका भी अहम रही। लंबे समय से विश्व तीरंदाजी की शीर्ष टीमों में शामिल दक्षिण कोरिया के खिलाफ भारतीय टीम की यह जीत खास मानी जा रही है।

कीर्ति की सफलता के पीछे केवल उनका खेल कौशल नहीं, बल्कि परिवार का त्याग, पिता का भरोसा और कोच उधम सिंह का मार्गदर्शन भी जुड़ा हुआ है। जिस उम्र में ज्यादातर बच्चे अपने भविष्य को लेकर शुरुआती सपने देख रहे होते हैं, उसी उम्र में कीर्ति ने तीरंदाजी को अपनी मेहनत और पहचान का रास्ता बना लिया था।

15 साल की उम्र में थामा था धनुष

कीर्ति शर्मा ने करीब 15 साल की उम्र में तीरंदाजी शुरू की थी। उस समय वह आठवीं कक्षा में पढ़ती थीं और पिल्लूखेड़ा के एफएस कॉन्वेंट स्कूल में शिक्षा ग्रहण कर रही थीं। इसी स्कूल में कोच उधम सिंह ने तीरंदाजी के लिए खिलाड़ियों को तैयार करना शुरू किया।

कोच की नजर कीर्ति पर भी पड़ी और उन्हें टीम में शामिल कर लिया गया। इसके बाद उनके सामने सबसे पहली जरूरत एक धनुष की थी। परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि महंगा उपकरण आसानी से खरीदा जा सके। पिता विजय शर्मा ने बेटी का हौसला बढ़ाते हुए स्कूल से 5 हजार रुपये में पुराना धनुष खरीद दिया।

यही पुराना धनुष कीर्ति के शुरुआती सफर का साथी बना। अभ्यास बढ़ा तो प्रतियोगिताओं का स्तर भी बढ़ता गया और आगे चलकर उन्हें बेहतर धनुष की जरूरत महसूस हुई।

60 हजार रुपये का कर्ज लेकर खरीदा नया धनुष

साल 2022 में हजारीबाग पदमा साईं, झारखंड में चयन के दौरान कीर्ति को नए धनुष की जरूरत पड़ी। उस समय परिवार के सामने फिर आर्थिक चुनौती खड़ी थी। लेकिन पिता विजय शर्मा ने बेटी के खेल को रुकने नहीं दिया।

उन्होंने आढ़ती से 60 हजार रुपये कर्ज लिया और पटियाला से बेटी के लिए नया धनुष खरीदा। पिता के इस फैसले ने कीर्ति के सफर को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बाद में साईं की ओर से कीर्ति शर्मा को करीब पांच लाख रुपये का धनुष भी दिलवाया गया।

एक किसान परिवार की बेटी का इस मुकाम तक पहुंचना इसलिए भी खास है, क्योंकि उसके पीछे महंगे संसाधनों से ज्यादा परिवार का भरोसा और लगातार मेहनत रही।

तीन एकड़ के किसान हैं पिता विजय शर्मा

कीर्ति शर्मा के पिता विजय शर्मा तीन एकड़ जमीन पर खेती करते हैं। जिस समय उन्हें बेटी के एशियन गेम्स में स्वर्ण पदक जीतने की खबर मिली, उस समय वह खेत में धान की फसल की कटाई करवा रहे थे। बेटी की उपलब्धि की खबर मिलते ही परिवार में खुशी की लहर दौड़ गई।

परिवार के लिए यह सिर्फ एक पदक नहीं है, बल्कि वर्षों के संघर्ष और त्याग का परिणाम है। आर्थिक तंगी के बावजूद पिता ने बेटी के खेल को आगे बढ़ाने में कोई कमी नहीं छोड़ी।

विजय शर्मा की पारिवारिक जिम्मेदारियां भी कम नहीं थीं। उनके परिवार में छह बहन और तीन बुआ हैं। इसके साथ ही उन्होंने अपने बच्चों की पढ़ाई और खेल को भी आगे बढ़ाने की कोशिश की।

भाई को भी खेल में आगे बढ़ाना चाहते थे पिता

कीर्ति के छोटे भाई 19 वर्षीय गौरव शर्मा फिलहाल हरिद्वार स्थित अमृता विश्वविद्यालय से कंप्यूटर साइंस ट्रेड में बीटेक कर रहे हैं। शुरुआत में पिता विजय शर्मा ने गौरव को भी तीरंदाजी में आगे बढ़ाने के बारे में सोचा था, लेकिन गौरव की रुचि पढ़ाई में अधिक थी। इसलिए उन्होंने अपनी पढ़ाई को प्राथमिकता दी।

वहीं कीर्ति ने कोच उधम सिंह के मार्गदर्शन में तीरंदाजी का अभ्यास जारी रखा और धीरे-धीरे राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई।

परिवार को अब ओलंपिक गोल्ड की उम्मीद

कीर्ति के एशियन गेम्स में स्वर्ण पदक जीतने के बाद उनके दादा राम जुआरी, दादी भरपाई देवी और मां गुड्डी देवी बेहद खुश हैं। परिवार का कहना है कि बेटी ने एशियन गेम्स में गोल्ड जीतकर देश और परिवार का नाम रोशन किया है।

परिवार को अब उम्मीद है कि कीर्ति शर्मा आने वाले समय में ओलंपिक में भी भारत के लिए स्वर्ण पदक जीतेंगी। जिस सफर की शुरुआत पुराने धनुष और सीमित संसाधनों के साथ हुई थी, वह अब अंतरराष्ट्रीय मंच पर स्वर्ण पदक तक पहुंच चुका है।

कीर्ति की कहानी यह दिखाती है कि खेलों में सफलता केवल बड़े संसाधनों से नहीं आती। कई बार एक परिवार का भरोसा, पिता का त्याग, कोच की मेहनत और खिलाड़ी का लगातार अभ्यास मिलकर ऐसी कहानी लिखते हैं, जिसे लंबे समय तक याद किया जाता है।