'पीड़िता नाबालिग हो तो सहमति का कोई महत्व नहीं...', पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट ने दुष्कर्म के दोषी की सजा रखी बरकरार
पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट ने दुष्कर्म मामले में दोषसिद्धि बरकरार रखते हुए कहा कि नाबालिग की सहमति का कोई महत्व नहीं। विशेष परिस्थितियों में आरोपी को सजा में राहत दी गई।
➤ हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, नाबालिग की सहमति का कोई महत्व नहीं
➤ दुष्कर्म मामले में दोषसिद्धि बरकरार, आरोपी को सजा में राहत
➤ 23 साल पुराने केस और स्वास्थ्य कारणों को देखते हुए नरमी
पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने दुष्कर्म के एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए दोषसिद्धि को बरकरार रखा, लेकिन विशेष परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए सजा में राहत प्रदान की है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि पीड़िता नाबालिग हो, तो उसकी सहमति का कोई कानूनी महत्व नहीं होता।
यह फैसला जस्टिस रुपिंदरजीत चहल की पीठ द्वारा सुनाया गया, जिसमें एक आरोपी ने ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई सजा को चुनौती दी थी। मामले के अनुसार, करीब 16 वर्षीय नाबालिग को आरोपी विवाह का झांसा देकर अपने साथ ले गया और उसकी इच्छा के विरुद्ध संबंध बनाए।
बचाव पक्ष ने दलील दी कि पीड़िता आरोपी के साथ अपनी मर्जी से गई थी और दोनों के बीच संबंध सहमति से बने थे। हालांकि, अदालत ने स्कूल रिकॉर्ड और पीड़िता की मां की गवाही के आधार पर यह स्पष्ट माना कि पीड़िता नाबालिग थी।
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि नाबालिग के मामले में सहमति का कोई कानूनी अस्तित्व नहीं होता। साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि मेडिकल रिपोर्ट में चोटों का अभाव या एफआईआर दर्ज कराने में देरी जैसे पहलू अभियोजन के मामले को कमजोर नहीं करते।
कोर्ट ने यह भी माना कि ऐसे मामलों में एफआईआर में देरी होना सामान्य बात है, क्योंकि सामाजिक दबाव, परिवार की प्रतिष्ठा और मानसिक स्थिति के कारण पीड़िता तुरंत शिकायत दर्ज नहीं करा पाती।
हालांकि सजा के मुद्दे पर अदालत ने कुछ विशेष परिस्थितियों को ध्यान में रखा। यह मामला करीब 23 साल पुराना था और आरोपी को लकवा (पैरालिसिस) का दौरा पड़ चुका है, जिससे उसका एक हिस्सा निष्क्रिय हो गया है। इसके अलावा दोनों पक्ष अपने-अपने जीवन में आगे बढ़ चुके हैं और अलग-अलग विवाह कर चुके हैं।
इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए अदालत ने सजा को घटाकर आरोपी द्वारा पहले ही जेल में बिताई गई अवधि तक सीमित कर दिया, लेकिन दोषसिद्धि को पूरी तरह बरकरार रखा।
यह फैसला न्याय व्यवस्था में संतुलन का उदाहरण माना जा रहा है, जहां एक ओर अपराध की गंभीरता को स्वीकार किया गया, वहीं दूसरी ओर मानवीय और विशेष परिस्थितियों को भी महत्व दिया गया।
Akhil Mahajan