HAU का बड़ा अनुसंधान: गुलाबी सुंडी से बचाएगा मक्का और दलहनी फसलों का फसल चक्र-जानें
चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय (HAU) के वैज्ञानिकों ने कपास में बढ़ते गुलाबी सुंडी के प्रकोप से निपटने के लिए फसल विविधीकरण (Crop Diversification) और फसल चक्र (Crop Rotation) को सबसे प्रभावी रणनीति बताया है। अनुसंधान के अनुसार, प्रभावित क्षेत्रों में कपास के स्थान पर मक्का और दलहनी फसलें अपनाने से न केवल सुंडी का जीवनचक्र टूट सकता है, बल्कि किसानों की आय, मिट्टी की उर्वरता और पानी की बचत में भी लाभ मिल सकता है।
➤ HAU अनुसंधान में गुलाबी सुंडी नियंत्रण के लिए फसल चक्र को सबसे प्रभावी रणनीति बताया
➤ मक्का के साथ दलहनी फसलों को अपनाने से मिट्टी की उर्वरता और किसानों की आय बढ़ने की उम्मीद
➤ IPM, फेरोमोन ट्रैप और जैविक नियंत्रण के साथ वैज्ञानिक खेती पर जोर
हिसार। हरियाणा में लगातार बढ़ रहे गुलाबी सुंडी (Pink Bollworm) के प्रकोप के बीच चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय (HAU) के वैज्ञानिकों ने एक महत्वपूर्ण अनुसंधान साझा किया है। शोध का निष्कर्ष है कि केवल कीटनाशकों पर निर्भर रहने की बजाय फसल विविधीकरण और वैज्ञानिक फसल चक्र अपनाकर इस समस्या पर अधिक प्रभावी नियंत्रण पाया जा सकता है।
वैज्ञानिकों के अनुसार, लगातार कई वर्षों तक एक ही खेत में कपास की खेती करने से गुलाबी सुंडी का जीवनचक्र बना रहता है। ऐसे में यदि प्रभावित क्षेत्रों में एक सीजन के लिए मक्का जैसी गैर-मेजबान फसल या दलहनी फसलें बोई जाएं, तो सुंडी का प्राकृतिक चक्र टूटता है और अगले कपास सीजन में उसका दबाव कम होने की संभावना रहती है।
मक्का क्यों है बेहतर विकल्प?
अनुसंधान में बताया गया है कि मक्का गुलाबी सुंडी का मेजबान पौधा नहीं है, इसलिए इस पर कीट अपना जीवनचक्र पूरा नहीं कर पाता। इसके अलावा मक्का की खेती में पानी और लागत अपेक्षाकृत कम आती है। पोल्ट्री उद्योग, पशु आहार और एथेनॉल क्षेत्र में बढ़ती मांग के कारण किसानों को बेहतर बाजार मिलने की भी संभावना रहती है।
वैज्ञानिकों ने यह भी स्पष्ट किया है कि इसका अर्थ कपास की खेती छोड़ना नहीं, बल्कि प्रभावित क्षेत्रों में वैज्ञानिक फसल चक्र अपनाना है, ताकि कीट का दबाव कम किया जा सके।
दलहनी फसलें भी बनेंगी किसानों की ताकत
HAU द्वारा साझा की गई कृषि सलाह के अनुसार, धान-गेहूं आधारित पारंपरिक फसल चक्र की जगह दलहनी फसलों को शामिल करने से कई लाभ मिल सकते हैं।
- मिट्टी की उर्वरा शक्ति में उल्लेखनीय सुधार।
- जैविक नाइट्रोजन स्थिरीकरण से रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम।
- सिंचाई के पानी की बचत।
- कम अवधि वाली किस्मों के कारण अगली फसल की समय पर बुवाई।
- किसानों की आय में विविध स्रोतों से बढ़ोतरी।
विश्वविद्यालय ने आरएचजी-725, आरएचजी-1975, आरएचजी-1201, एचपीएम-421, एचपीएम-1142 और एचपीएम-1772 जैसी उन्नत दलहनी किस्मों को भी उपयुक्त बताया है।
समय पर मूंग की बुवाई भी फायदेमंद
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, कपास के स्थान पर मक्का लेने के बाद कम अवधि वाली मूंग की समय पर बुवाई भी की जा सकती है। इससे खेत खाली नहीं रहता, अतिरिक्त आय मिलती है और फसल विविधीकरण को बढ़ावा मिलता है।
IPM के 4 वैज्ञानिक उपाय
यदि किसान कपास की खेती जारी रखना चाहते हैं, तो HAU ने एकीकृत कीट प्रबंधन (Integrated Pest Management - IPM) अपनाने की सलाह दी है।
| उपाय | लाभ |
|---|---|
| फेरोमोन ट्रैप | नर पतंगों की निगरानी और समय पर प्रबंधन |
| ट्राइकोग्राम कार्ड | सुंडी के अंडों का जैविक नियंत्रण |
| प्रमाणित बीज | बेहतर प्रतिरोध क्षमता वाली किस्में |
| गहरी जुताई | मिट्टी में छिपे कोशितों (Pupa) का नाश |
विशेषज्ञों का कहना है कि फसल विविधीकरण + फसल चक्र + IPM का संयुक्त मॉडल ही गुलाबी सुंडी के दीर्घकालिक नियंत्रण और टिकाऊ कृषि का सबसे प्रभावी रास्ता है।
Akhil Mahajan