30 हजार शो, हजारों चैरिटी कार्यक्रम और जादू को लेकर बड़ा संदेश, सम्राट शंकर ने खोले कई राज
जादूगर सम्राट शंकर ने 30 हजार शो, चैरिटी, अंधविश्वास, योग, नई पीढ़ी और जादू को कला के रूप में बचाने की जरूरत पर खुलकर बात की
➤ करीब 30 हजार शो करने और बड़ी संख्या में चैरिटी कार्यक्रमों का दावा, जादूगर सम्राट शंकर ने सुनाई लंबी यात्रा
➤ जादू को चमत्कार नहीं बल्कि कला बताते हुए अंधविश्वास से बचने और कर्म पर भरोसा करने की अपील
➤ 77 की उम्र में रोजाना योग-प्राणायाम, नई पीढ़ी को जादू सिखाने और सामाजिक मुद्दों पर शो करने पर जोर
जादूगर सम्राट शंकर ने एक विशेष बातचीत में अपने लंबे जादुई सफर, चैरिटी कार्यक्रमों, जादू की बदलती दुनिया, अंधविश्वास और नई पीढ़ी को इस कला से जोड़ने की जरूरत पर विस्तार से बात की। बातचीत के दौरान उन्होंने बताया कि उन्होंने देश-विदेश में करीब 30 हजार शो किए हैं और उनके अनुसार इनमें करीब 20 हजार शो चैरिटी के लिए किए गए। उन्होंने यह भी कहा कि देश में युद्ध, प्राकृतिक आपदा या अन्य संकट के समय उन्होंने अपने शो के माध्यम से सहायता जुटाने की कोशिश की और करीब 2 करोड़ रुपये सरकार को दान करने का दावा किया। बातचीत में यह भी सामने आया कि जादू की कला को वह केवल मनोरंजन नहीं बल्कि भारत की एक महत्वपूर्ण कला मानते हैं, जिसके संरक्षण और नई पीढ़ी तक पहुंचाने की जरूरत है।
सम्राट शंकर ने बताया कि उनका जन्म हरियाणा के सिरसा जिले के इलाहाबाद में हुआ। परिवार का संबंध राजस्थान से रहा और उन्होंने अपने जीवन के शुरुआती दौर में ही जादू की ओर आकर्षण महसूस किया। उनके मुताबिक बचपन में उन्होंने जादूगर देव कुमार का शो देखा था। उस समय उनकी उम्र करीब 12 वर्ष थी। शो ने उन्हें इतना प्रभावित किया कि उन्होंने उसी जादूगर के शो करीब 245 बार देखने की बात कही। धीरे-धीरे जादू सीखने की इच्छा इतनी मजबूत हुई कि उन्होंने इसे अपना जीवन बनाने का संकल्प कर लिया।
उन्होंने बताया कि परिवार की इच्छा थी कि वह पढ़ाई के बाद कारोबार या किसी दूसरे पारंपरिक पेशे में जाएं। उनका अपना सपना इंजीनियर बनने का था, लेकिन जादू के प्रति बढ़ते आकर्षण ने उन्हें अलग रास्ता चुनने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने पढ़ाई के साथ दिल्ली में जादू सीखना जारी रखा। उनके अनुसार रास्ते में कई लोगों ने उन्हें हतोत्साहित करने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने आलोचनाओं पर ध्यान देने के बजाय अपने लक्ष्य पर काम किया।
शादी से जुड़ा किस्सा भी बातचीत में सामने आया। सम्राट शंकर ने बताया कि 1975 में उनकी शादी के समय जादूगर होने को लेकर परिवार और समाज में कई तरह की आशंकाएं थीं। लोगों को डर था कि जादूगर होने के कारण शादीशुदा जीवन में भी वह जादू का इस्तेमाल करेंगे। उन्होंने इस दौर की कठिनाइयों को याद करते हुए कहा कि उस समय उनका जादू का सामान, जिसमें कबूतर और खरगोश भी शामिल थे, घर से बाहर तक फेंक दिया गया था। बाद में यही पहचान उनके परिवार के लिए सम्मान का कारण बनी।
जादू चमत्कार नहीं, एक कला है
जादू की वास्तविकता को लेकर पूछे गए सवाल पर सम्राट शंकर ने साफ कहा कि वह इसे फाइन आर्ट यानी कला के रूप में देखते हैं। उनके अनुसार स्टेज पर दिखाई देने वाले कई हैरतअंगेज दृश्य तकनीक, ट्रिक, हाथ की सफाई और प्रस्तुति पर आधारित होते हैं। उन्होंने बातचीत में बताया कि उनके हिसाब से करीब 75 प्रतिशत हिस्सा ट्रिक्स और हाथ की सफाई से जुड़ा होता है, जबकि बाकी हिस्से में हिप्नोटिज्म तथा प्रस्तुति से जुड़े प्रभाव शामिल हो सकते हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि जादू का इस्तेमाल लोगों को अंधविश्वास से बाहर निकालने के लिए किया जाना चाहिए। उन्होंने लोगों को ऐसे दावों से सावधान रहने की सलाह दी, जिनमें सोना बनाने, नोट दोगुने करने या किसी चमत्कारी शक्ति से धन बढ़ाने की बात कही जाती है। उनका कहना था कि जादू को चमत्कार मानकर किसी के बहकावे में आने के बजाय वास्तविकता को समझना चाहिए।
करोड़ों रुपये के ऑफर का भी किया जिक्र
बातचीत में सम्राट शंकर ने एक बड़े ऑफर का किस्सा भी सुनाया। उनके अनुसार एक व्यक्ति ने उनका शो देखने के बाद उन्हें करीब 30 से 40 करोड़ रुपये का फार्म हाउस उनके नाम करने तक का प्रस्ताव दिया था। बदले में उनसे कहा गया था कि वह जादूगर के बजाय कथित धार्मिक चमत्कार दिखाने वाले व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत हों। सम्राट शंकर ने बताया कि उन्होंने ऐसा करने से इनकार कर दिया क्योंकि उन्होंने अपना पूरा जीवन जादू की कला के नाम किया है।
उन्होंने यह भी दावा किया कि जादू की कला के जरिए उन्होंने लोगों के भ्रम दूर करने की कोशिश की है और कुछ ऐसे मामलों में भी मदद की, जिनमें परिवार या व्यक्तिगत जीवन से जुड़ी गंभीर परेशानियां थीं। उन्होंने इस काम को अपनी कला के सामाजिक उपयोग का हिस्सा बताया।
संतों और कथित चमत्कारों पर क्या बोले।
धार्मिक क्षेत्र में दिखाई जाने वाली कथित चमत्कारी घटनाओं के सवाल पर उन्होंने संतों के प्रति सामान्य रूप से सम्मान जताया। उन्होंने कहा कि सभी संतों को एक नजर से नहीं देखा जाना चाहिए। उनके अनुसार अधिकांश संत लोगों को सत्संग और ध्यान के माध्यम से मानसिक शांति देने का काम करते हैं, जबकि कुछ लोग लोगों को गुमराह कर सकते हैं। उन्होंने ऐसे मामलों को गलत बताया।
सम्राट शंकर ने बातचीत में अपने लंदन के शो का भी किस्सा सुनाया। उन्होंने बताया कि एक कार्यक्रम के लिए निर्धारित समय से देर से पहुंचने के बाद उन्होंने वहां मौजूद दर्शकों के सामने अपनी कला का इस्तेमाल किया। बातचीत के दौरान उन्होंने घड़ी और समय से जुड़े कुछ प्रयोग भी करके दिखाए, जिनका उद्देश्य दर्शकों को जादू की प्रस्तुति का अनुभव कराना था।
प्रेमानंद जी महाराज के साथ मुलाकात का भी जिक्र।
बातचीत में प्रेमानंद जी महाराज के साथ हुई मुलाकात का भी उल्लेख आया। इंटरव्यू में इस मुलाकात को लेकर चर्चा हुई और बताया गया कि उस दौरान जादू की प्रस्तुति ने वहां मौजूद लोगों को खूब हंसाया। सम्राट शंकर ने कहा कि इसके बाद उन्हें विदेशों से भी फोन आए और लोगों ने इस मुलाकात को लेकर प्रतिक्रिया दी।
उन्होंने इस मौके पर फिर दोहराया कि जादू को चमत्कार समझने के बजाय कला के रूप में देखना चाहिए। उनका संदेश था कि व्यक्ति को भ्रम में पड़ने के बजाय अपने कर्म पर विश्वास करना चाहिए।
बड़े नेताओं के साथ भी किए जादू के प्रयोग।
सम्राट शंकर ने बातचीत में बताया कि उन्होंने कई बड़े राजनेताओं और सार्वजनिक जीवन से जुड़े लोगों के साथ भी अपने जादुई प्रयोग किए हैं। बातचीत में पूर्व रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव का भी उल्लेख हुआ। उन्होंने बताया कि उन्होंने कई प्रमुख लोगों के साथ हथकड़ी और अन्य जादुई प्रयोग किए हैं।
मोबाइल के दौर में जादू की नई चुनौती।
सम्राट शंकर ने माना कि आज की पीढ़ी के सामने जादू की कला के लिए सबसे बड़ी चुनौती मनोरंजन के बदलते साधन हैं। मोबाइल फोन, सोशल मीडिया, यूट्यूब और रील्स के बढ़ते प्रभाव के कारण बच्चों का ध्यान लंबे समय तक किसी पारंपरिक मंचीय कला पर टिकाना मुश्किल हो रहा है। उन्होंने कहा कि जादू की कला को बचाने के लिए सरकारी स्तर पर भी प्रोत्साहन मिलना चाहिए। उनके मुताबिक जिस तरह खिलाड़ियों को प्रोत्साहन दिया जाता है, उसी तरह इस कला के कलाकारों के लिए भी सहयोग और सम्मान की व्यवस्था होनी चाहिए।
उन्होंने नई पीढ़ी को जादू से जोड़ने के लिए मैजिक बॉक्स और पुस्तकों के माध्यम से ट्रिक्स सिखाने की पहल का भी उल्लेख किया। उनके अनुसार बच्चों को मोबाइल से कुछ समय दूर करके रचनात्मक गतिविधियों से जोड़ना जरूरी है। उन्होंने बताया कि सामाजिक संदेशों को भी अपने शो का हिस्सा बनाया जाता है। नशामुक्ति, बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ, कन्या भ्रूण हत्या, पानी की समस्या और पर्यावरण जैसे विषयों पर जादू के कार्यक्रम तैयार किए गए हैं, ताकि मनोरंजन के साथ लोगों तक सामाजिक संदेश भी पहुंच सके।
77 की उम्र में भी योग को जीवन का हिस्सा बताया।
सम्राट शंकर ने बातचीत में अपनी दिनचर्या का उल्लेख करते हुए कहा कि 77 वर्ष की उम्र में भी वह योग और प्राणायाम करते हैं। उन्होंने बताया कि वह रोजाना करीब एक से डेढ़ घंटे योग और प्राणायाम के लिए देते हैं। उन्होंने अपने गुरु के रूप में स्वामी देवीदास जी का उल्लेख किया और कहा कि योग उनके जीवन तथा जादू की कला से भी जुड़ा रहा है।
उन्होंने खान-पान में संतुलन रखने और तली-भुनी चीजों को सीमित मात्रा में लेने की सलाह भी दी। उनका कहना था कि जीवन में संतुलन जरूरी है और नियमित योग के लिए दिन में समय निकालना चाहिए।
जादू की अगली पीढ़ी तैयार करने की कोशिश।
सम्राट शंकर ने बताया कि जादूगरों की बैठकों और सम्मेलनों के माध्यम से छोटे-बड़े कलाकारों को एक साथ लाने की कोशिश की जाती है। उनका उद्देश्य नई प्रतिभाओं को मंच देना, उन्हें अभ्यास का अवसर देना और आने वाले वर्षों के लिए जादू की नई पीढ़ी तैयार करना है। उन्होंने कहा कि जादू की कला तभी आगे बढ़ेगी, जब युवा कलाकार इसे सीखने और मंच पर प्रस्तुत करने के लिए आगे आएंगे।
बातचीत के अंत में उन्होंने कार्ड और रंग बदलने जैसे कुछ जादुई प्रयोगों का प्रदर्शन भी किया। कार्ड की पहचान और कागज का रंग बदलने वाले प्रयोगों के जरिए उन्होंने दर्शकों को बताया कि जादू का उद्देश्य आंखों के सामने ऐसा अनुभव पैदा करना है, जो पहली नजर में चमत्कार जैसा लगे, लेकिन कलाकार इसे तकनीक और प्रस्तुति के जरिए पेश करता है।
सम्राट शंकर की बातचीत का सबसे बड़ा संदेश यही रहा कि जादू को चमत्कार समझने के बजाय कला के रूप में देखा जाए और किसी भी कथित चमत्कार के नाम पर लोगों को गुमराह नहीं किया जाना चाहिए। उनका जोर इस बात पर भी रहा कि भारत की इस पारंपरिक मनोरंजन कला को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए कलाकारों, समाज और संस्थाओं को मिलकर प्रयास करना होगा।
Akhil Mahajan