हलवा पूरी से तैयार यह है हरियाणा का चांद, 800किलो के फौलाद पर रेगिस्तान की गर्मी-सर्दी बेअसर
कुरुक्षेत्र पशु मेले में थारपारकर नस्ल का 800 किलो वजन वाला बुल चांद लोगों के आकर्षण का केंद्र बना, 5 बार का चैंपियन रह चुका है।
➤ फतेहाबाद से पहुंचा थारपारकर नस्ल का बुल, देखने उमड़ी भारी भीड़
➤ 4 साल की उम्र में 800 किलो वजन, रेगिस्तान की गर्मी-सर्दी बेअसर
➤ हलवा-पुरी और देसी खुराक से तैयार, 20 बच्चों का पिता
हरियाणा के कुरुक्षेत्र स्थित KDB मेला ग्राउंड में चल रहे राज्य स्तरीय पशु मेले में इस बार एक खास मेहमान लोगों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। थारपारकर नस्ल का विशालकाय बुल ‘चांद’ अपनी मजबूत कद-काठी और शांत स्वभाव के चलते मेले में चर्चा का विषय बना हुआ है। फतेहाबाद जिले के मोहम्मदपुर रोही गांव के पशुपालक लोकेश गुर्जर चांद को लेकर मेले में पहुंचे हैं।
करीब 4 साल की उम्र में 800 किलोग्राम वजन वाला चांद जब मेले में घूमता है, तो उसे देखने के लिए लोगों की भीड़ लग जाती है। पशुपालक लोकेश का कहना है कि चांद जहां भी गया, वहां उसने निराश नहीं किया और अब तक 5 बार चैंपियन रह चुका है।
चैंपियनशिप का पुराना खिलाड़ी
लोकेश गुर्जर ने बताया कि चांद ने कई पशु मेलों और प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया है। महेंद्रगढ़ में हुई चैंपियनशिप में चांद ने पहला स्थान हासिल किया था। लोकेश का कहना है कि उन्होंने चांद को पूरी तरह देसी खुराक पर पाला है और थारपारकर जैसी दुर्लभ नस्ल को बचाने का प्रयास कर रहे हैं।
रेगिस्तान की नस्ल, हर मौसम में फिट
थारपारकर नस्ल मूल रूप से पाकिस्तान के सिंध और भारत के राजस्थान के जैसलमेर क्षेत्र में पाई जाती है। इसे थारपारकर इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह नस्ल रेगिस्तान के ऊंचे-ऊंचे टीलों को आसानी से पार कर लेती है। यह नस्ल भीषण गर्मी और कड़ाके की सर्दी दोनों को सहन करने में सक्षम होती है, जिससे इसकी मांग पशुपालकों के बीच बनी रहती है।
हलवा-पुरी से लेकर देसी आहार तक
लोकेश बताते हैं कि चांद को खाने का बड़ा शौक है। वह हलवा, पुरी और चूरी बड़े चाव से खाता है। दिन में दो बार हरा चारा दिया जाता है, जबकि रात में खल-बिनौला, दलिया, गुड़ और गेहूं का आटा मिलाकर खिलाया जाता है। चांद रोजाना 3 लीटर देसी गाय का दूध भी पीता है, जिसमें मल्टीविटामिन और सप्लीमेंट मिलाए जाते हैं।
इसके अलावा हफ्ते में दो-तीन बार दूध में घी दिया जाता है। हर रविवार उसे सब्जियां जैसे गाजर, पत्ता गोभी और पालक खिलाई जाती हैं। चांद की फिटनेस के लिए रोजाना करीब 2 किलोमीटर की सैर भी कराई जाती है।
15 लाख की कीमत ठुकराई
पशुपालक लोकेश ने दावा किया कि भिवानी मेले में आंध्र प्रदेश से आई एक पार्टी ने चांद को खरीदने के लिए पहले 13 लाख और फिर 15 लाख रुपए तक की पेशकश की थी, लेकिन उन्होंने चांद को बेचने से इनकार कर दिया। लोकेश का कहना है कि चांद उन्हें गिफ्ट में मिला था, इसलिए उसे बेचना उन्हें ठीक नहीं लगा।
20 बच्चों का पिता, नस्ल सुधार में योगदान
लोकेश ने बताया कि चांद अब तक 20 बछड़ों का पिता बन चुका है। वे HLDB हिसार के साथ मिलकर थारपारकर नस्ल के संरक्षण और सुधार पर काम कर रहे हैं। उनका कहना है कि यह नस्ल धीरे-धीरे खत्म होती जा रही है, जबकि यह हर मौसम में रहने योग्य और बेहद मजबूत नस्ल है।
Akhil Mahajan