चुनाव आयोग पर घमासान: राहुल गांधी के आरोपों से गरमाई सियासत, 97 वोटरों के मामले ने बढ़ाए सवाल
राहुल गांधी ने चुनाव आयोग और CEC ज्ञानेश कुमार पर गंभीर आरोप लगाए। दो आयुक्तों की आपत्तियों और गोवा के 97 वोटरों का मामला भी चर्चा में आया।
➤ दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों पर विपक्ष ने उठाए गंभीर सवाल
➤ राहुल गांधी ने CEC ज्ञानेश कुमार और केंद्र सरकार पर लगाए आरोप
➤ गोवा के 97 योग्य वोटरों के नाम नहीं जुड़ने का मामला भी चर्चा में
नई दिल्ली। चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर सामने आई एक मीडिया रिपोर्ट के बाद देश की राजनीति में नया विवाद खड़ा हो गया है। रिपोर्ट में दावा किया गया कि चुनाव आयोग के दो सदस्यों ने पिछले करीब 10 महीनों में आयोग के कुछ फैसलों और प्रक्रियाओं पर कई बार आपत्ति दर्ज कराई थी। रिपोर्ट के मुताबिक, इन आपत्तियों का संबंध मतदाता सूची में नाम जोड़ने-हटाने, Special Intensive Revision (SIR), मतदाता डेटा और केंद्रीय सॉफ्टवेयर व्यवस्था से जुड़े मामलों से था। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने कम से कम 14 मौकों पर विभिन्न कदमों को लेकर आपत्तियां दर्ज की थीं।
इसी रिपोर्ट को आधार बनाकर लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने 24 सितंबर को प्रेस कॉन्फ्रेंस की और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर कई सवाल उठाए। राहुल गांधी ने पावरपॉइंट प्रेजेंटेशन के जरिए मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार, केंद्र सरकार और चुनावी प्रक्रिया को लेकर अपने आरोप सामने रखे। उन्होंने दावा किया कि मतदाता सूची और चुनाव प्रक्रिया में कथित गड़बड़ियों का असर चुनावी नतीजों तक पड़ सकता है। राहुल गांधी ने अपने संबोधन में बेहद तीखे शब्दों का इस्तेमाल करते हुए चुनाव आयोग पर संविधान और लोकतांत्रिक व्यवस्था के खिलाफ काम करने का आरोप लगाया तथा CEC ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की। उनके इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि इस रिपोर्ट से नहीं होती और चुनाव आयोग तथा बीजेपी ने राहुल गांधी के दावों को खारिज किया है।
राहुल गांधी ने उठाया ‘एंटी-इंकंबेंसी’ का सवाल
राहुल गांधी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की शुरुआत इस सवाल से की कि बीजेपी के खिलाफ एंटी-इंकंबेंसी क्यों नहीं दिखाई देती। इसके बाद उन्होंने चुनावी प्रक्रिया, मतदाता सूची और चुनाव आयोग के फैसलों को लेकर अपने सवालों को एक बड़े राजनीतिक आरोप से जोड़ा। उनका कहना था कि चुनावों में कथित ‘वोट चोरी’ केवल चुनावी विवाद नहीं है, बल्कि इससे लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता का सवाल जुड़ता है।
राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की भूमिका और केंद्र सरकार के बीच संबंधों की जांच होनी चाहिए। उन्होंने यह भी दावा किया कि जिन चुनावों का संचालन ज्ञानेश कुमार के कार्यकाल में हुआ, उन सभी को लेकर सवाल खड़े होते हैं। हालांकि, ‘वोट चोरी’ संबंधी राहुल गांधी के आरोप राजनीतिक आरोप हैं और चुनाव आयोग ने इस निष्कर्ष को स्वीकार नहीं किया है। चुनाव आयोग का कहना है कि उसके अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए।
किन चुनावों का राहुल गांधी ने किया जिक्र
राहुल गांधी ने अपने तर्क में ज्ञानेश कुमार के मुख्य चुनाव आयुक्त बनने के बाद हुए विभिन्न विधानसभा चुनावों का भी उल्लेख किया। इनमें बिहार विधानसभा चुनाव 2025 तथा 2026 में हुए असम, केरल, पुडुचेरी, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव शामिल हैं।
उपलब्ध चुनाव परिणामों के मुताबिक, 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में NDA को बहुमत मिला था। 2026 में असम में बीजेपी के नेतृत्व वाले गठबंधन, केरल में UDF, पश्चिम बंगाल में बीजेपी और तमिलनाडु में TVK सबसे बड़े राजनीतिक समूह के रूप में सामने आए, जबकि पुडुचेरी में AINRC सबसे अधिक सीटों वाली पार्टी रही।
इन नतीजों को राहुल गांधी ने चुनावी प्रक्रिया से जुड़े अपने सवालों के संदर्भ में पेश किया। दूसरी ओर, बीजेपी ने कहा कि चुनाव परिणामों को लेकर लगाए जा रहे आरोपों को मीडिया रिपोर्ट में सामने आई आंतरिक आपत्तियों के आधार पर साबित नहीं किया जा सकता। बीजेपी प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने कहा कि चुनाव आयोग में अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए और ऐसा कोई सबूत नहीं है कि आयोग ने बहुमत के आधार पर फैसले किए हों।
चुनाव आयोग ने क्या कहा
विवाद बढ़ने के बाद चुनाव आयोग ने रिपोर्ट में बताए गए मतभेदों को लेकर अपना पक्ष रखा। आयोग के अनुसार, बहु-सदस्यीय संवैधानिक संस्था में अलग-अलग सदस्य किसी विषय पर अपनी राय, सुझाव या टिप्पणी रख सकते हैं। लेकिन आयोग का दावा है कि अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए।
यानी इस पूरे विवाद में दो अलग-अलग बातें सामने आ रही हैं। एक तरफ रिपोर्ट में दो चुनाव आयुक्तों की ओर से दर्ज की गई आपत्तियों का हवाला दिया गया है। दूसरी तरफ आयोग का कहना है कि इन व्यक्तिगत टिप्पणियों या आपत्तियों को अंतिम निर्णय से असहमति नहीं माना जा सकता और SIR समेत आयोग के सभी अंतिम फैसले सर्वसम्मति से हुए।
यही अंतर इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है। सवाल यह है कि अगर आंतरिक स्तर पर किसी प्रक्रिया या फैसले को लेकर आपत्ति दर्ज की गई थी, तो उसका अंतिम निर्णय पर क्या प्रभाव पड़ा और आयोग की निर्णय प्रक्रिया वास्तव में किस तरह चली। इसका जवाब सार्वजनिक रिकॉर्ड, संबंधित दस्तावेजों और आयोग की विस्तृत सफाई से ही स्पष्ट हो सकता है।
2023 के कानून और चुनाव आयुक्तों को मिली सुरक्षा का मुद्दा
राहुल गांधी ने मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023 का भी जिक्र किया। इस कानून की धारा 16 में मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों को उनके आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन में किए गए कार्यों या लिए गए फैसलों के संबंध में कानूनी कार्यवाही से सुरक्षा का प्रावधान है। यह प्रावधान आधिकारिक कर्तव्य के दौरान किए गए कार्यों से संबंधित है और कानून में इसकी विस्तृत शर्तें दी गई हैं।
राहुल गांधी ने इस प्रावधान को लेकर सवाल उठाया और कहा कि इससे चुनाव आयुक्तों की जवाबदेही को लेकर चिंता पैदा होती है। हालांकि, कानून में दी गई सुरक्षा को किसी भी प्रकार की सभी परिस्थितियों में पूर्ण कानूनी छूट के रूप में नहीं पढ़ा जा सकता। इसका दायरा आधिकारिक कर्तव्यों के दौरान किए गए कार्यों और कानून में निर्धारित परिस्थितियों से जुड़ा है।
ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कार्रवाई की चर्चा
विवाद के बीच विपक्षी दलों की ओर से CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कार्रवाई की मांग भी तेज हुई है। कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों के बीच इस मुद्दे पर संसद में प्रस्ताव लाने को लेकर चर्चा की खबरें सामने आई हैं। हालांकि, किसी भी संवैधानिक पदाधिकारी को हटाने की प्रक्रिया राजनीतिक मांग से अलग एक निर्धारित संवैधानिक और संसदीय प्रक्रिया के तहत चलती है।
संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त को सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के समान तरीके और समान आधार पर हटाया जा सकता है। वहीं अन्य चुनाव आयुक्तों को हटाने की प्रक्रिया मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफारिश से जुड़ी है।
इसलिए किसी प्रस्ताव की राजनीतिक घोषणा और पद से हटाने की वास्तविक संवैधानिक प्रक्रिया अलग-अलग चरण हैं। आगे इस मामले में संसद में क्या कदम उठाया जाता है, यह राजनीतिक दलों की रणनीति और निर्धारित संसदीय प्रक्रिया पर निर्भर करेगा।
गोवा के 97 वोटरों का मामला क्यों अहम
इस पूरे विवाद के बीच गोवा के 97 मतदाताओं का मामला भी सामने आया है। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, SIR प्रक्रिया के दौरान इन मतदाताओं के नाम कुछ ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ के आधार पर चिन्हित किए गए थे। बाद में स्थानीय Electoral Registration Officers (EROs) ने दस्तावेजों और दावों की जांच की और रिपोर्ट के अनुसार इन 97 लोगों को मतदाता सूची में शामिल किए जाने के योग्य पाया।
मामला यहीं खत्म नहीं हुआ। रिपोर्ट के अनुसार, इन नामों को वापस जोड़ने के लिए इस्तेमाल किए जा रहे ECINet सॉफ्टवेयर में स्थानीय अधिकारियों के स्तर पर पहले लिए गए निर्णय को पलटने का विकल्प उपलब्ध नहीं था। इसके बाद गोवा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय ने चुनाव आयोग को कई बार संपर्क किया।
रिपोर्ट के अनुसार, 17 फरवरी को गोवा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय ने सात दिनों में आठवीं बार चुनाव आयोग से संपर्क किया था। इसमें उन 97 मतदाताओं के नामों को अंतिम सूची में शामिल करने के लिए आवश्यक तकनीकी कार्रवाई की मांग की गई थी। अगले दिन आयोग के एक उप चुनाव आयुक्त ने भी आईटी विभाग को लिखा कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप आवश्यक कार्रवाई को सिस्टम के स्तर पर रोका नहीं जाना चाहिए।
इसके बावजूद, 21 फरवरी को प्रकाशित अंतिम मतदाता सूची में ये 97 नाम शामिल नहीं हो सके। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, 20 सितंबर तक भी इन नामों को अंतिम सूची में नहीं जोड़ा गया था। गोवा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने अखबार को बताया कि संबंधित मामलों के बारे में ECI को अवगत कराया गया था और उन्होंने यह भी कहा कि ERO स्तर पर मतदाताओं को दोबारा शामिल करने की व्यवस्था होनी चाहिए।
दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों से जुड़ा सबसे बड़ा सवाल
गोवा का मामला इसलिए भी चर्चा में आया क्योंकि इससे उस व्यापक सवाल से जोड़कर देखा जा रहा है जिसे दो चुनाव आयुक्तों की कथित आपत्तियों वाली रिपोर्ट ने उठाया है। रिपोर्ट के अनुसार, सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने मतदाता सूची में नाम जोड़ने और हटाने, डेटा प्रबंधन और ECINet के केंद्रीकरण जैसे मुद्दों को लेकर आपत्तियां दर्ज की थीं।
दूसरी तरफ, चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया है कि आंतरिक विचार-विमर्श में अलग-अलग राय होना संस्थागत प्रक्रिया का हिस्सा है और अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए। इसलिए अभी इस विवाद के दो प्रमुख पक्ष हैं। पहला, मीडिया रिपोर्टों में सामने आए आंतरिक दस्तावेजों और आपत्तियों का विवरण। दूसरा, चुनाव आयोग का यह आधिकारिक पक्ष कि इन आपत्तियों के बावजूद अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए।
राजनीतिक टकराव और तेज
इस मुद्दे पर कांग्रेस और बीजेपी आमने-सामने हैं। राहुल गांधी और कांग्रेस ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर आरोप लगाए हैं। दूसरी ओर बीजेपी ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि आंतरिक deliberations में मतभेद या सुझावों को अंतिम निर्णय से असहमति के प्रमाण के रूप में पेश नहीं किया जा सकता। बीजेपी ने राहुल गांधी की प्रस्तुति में इस्तेमाल सामग्री और उनके निष्कर्षों पर भी सवाल उठाए हैं।
इस पूरे विवाद में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि चुनाव आयोग भारत की चुनावी व्यवस्था की संवैधानिक संस्था है। संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत चुनावों और मतदाता सूचियों की तैयारी पर आयोग को व्यापक संवैधानिक जिम्मेदारी दी गई है। इसलिए मतदाता सूची, सॉफ्टवेयर व्यवस्था, आंतरिक निर्णय प्रक्रिया और आयोग की पारदर्शिता से जुड़े सवालों का सार्वजनिक और दस्तावेज-आधारित स्पष्टीकरण महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
फिलहाल राहुल गांधी के आरोप, विपक्ष की राजनीतिक मांगें, बीजेपी का पलटवार और चुनाव आयोग की सफाई एक साथ सामने हैं। 97 गोवा मतदाताओं का मामला इस बहस को जमीन पर मतदाता सूची से जुड़ा एक ठोस उदाहरण देता है, जबकि दो चुनाव आयुक्तों की कथित आपत्तियों की रिपोर्ट आयोग की आंतरिक निर्णय प्रक्रिया पर सवाल उठाती है। अब इस विवाद का अगला चरण इस बात पर निर्भर करेगा कि चुनाव आयोग इन मामलों से जुड़े दस्तावेजों और प्रक्रियाओं पर कितनी विस्तृत जानकारी सार्वजनिक करता है तथा विपक्ष संसद और अन्य संवैधानिक मंचों पर इस मुद्दे को किस तरह आगे बढ़ाता है।
Akhil Mahajan