लोकसभा में बड़ा घटनाक्रम: महिला आरक्षण बिल गिरा, दो-तिहाई बहुमत नहीं मिलने से सरकार को झटका

लोकसभा में महिला आरक्षण से जुड़ा नारी शक्ति वंदन विधेयक दो-तिहाई बहुमत नहीं मिलने के कारण पारित नहीं हो सका, जिससे राजनीति गरमा गई है।

लोकसभा में बड़ा घटनाक्रम: महिला आरक्षण बिल गिरा, दो-तिहाई बहुमत नहीं मिलने से सरकार को झटका
  • महिला आरक्षण बिल लोकसभा में पारित नहीं हो सका
  • दो-तिहाई बहुमत नहीं मिलने से नारी शक्ति वंदन विधेयक गिरा
  • परिसीमन मुद्दे पर विपक्ष के विरोध से सरकार को झटका

देश की राजनीति में बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। महिलाओं को लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में 33 प्रतिशत आरक्षण देने से जुड़ा नारी शक्ति वंदन संशोधन विधेयक (131वां संविधान संशोधन विधेयक) लोकसभा में पारित नहीं हो सका। आवश्यक दो-तिहाई बहुमत नहीं मिलने के कारण यह विधेयक गिर गया।

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला द्वारा कराए गए मत विभाजन में कुल 528 वोट पड़े, जिनमें 298 समर्थन में और 230 विरोध में रहे। हालांकि साधारण बहुमत मिला, लेकिन संविधान संशोधन के लिए जरूरी दो-तिहाई बहुमत हासिल नहीं हो पाया।

इस मुद्दे पर सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच तीखी टकराव की स्थिति बनी रही। विपक्ष ने मुख्य रूप से परिसीमन (Delimitation) को लेकर चिंता जताई और इसका विरोध किया। विपक्ष का कहना था कि परिसीमन के जरिए सीटों की संरचना में बदलाव किया जा सकता है।

वहीं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने विपक्ष को आश्वासन दिया था कि सभी राज्यों में संतुलन बनाए रखा जाएगा और सीटों की संख्या बढ़ने से महिलाओं को उचित प्रतिनिधित्व मिलेगा।

सरकार की ओर से यह भी कहा गया कि सीटों में वृद्धि के बाद ही आरक्षण को प्रभावी तरीके से लागू किया जा सकता है। गृह मंत्री अमित शाह ने यहां तक कहा कि इस प्रावधान को लिखित रूप में विधेयक में शामिल करने के लिए भी सरकार तैयार है।

दो दिनों तक चली लंबी बहस के बाद जब परिणाम घोषित हुआ, तो विपक्षी खेमे में खुशी का माहौल देखने को मिला। वहीं, सत्तापक्ष ने विपक्ष पर महिला विरोधी होने का आरोप लगाया।

संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजीजू ने कहा कि यह एक ऐतिहासिक मौका था, लेकिन विपक्ष ने सहयोग नहीं किया। दूसरी ओर, भाजपा नेताओं ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि उनके कारण महिलाओं को आरक्षण मिलने में देरी होगी।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मुद्दा आने वाले 2029 के चुनावों में बड़ा चुनावी मुद्दा बन सकता है, जहां सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों इसे अपने-अपने तरीके से भुनाने की कोशिश करेंगे।