18 साल की सेवा के बाद सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, सोनीपत में लंबे समय तक रहे प्रदीप अत्री-पंकज गौड़ समेत चार अफसर डिमोट

सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा के चार इंजीनियरों का B&R विभाग में किया गया स्थायी अवशोषण रद्द कर दिया है। इनमें प्रदीप अत्री और पंकज गौड़ शामिल हैं, जो लंबे समय तक सोनीपत में सेवाएं दे चुके हैं। चारों को मूल विभाग में लौटने के निर्देश दिए गए हैं।

18 साल की सेवा के बाद सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, सोनीपत में लंबे समय तक रहे प्रदीप अत्री-पंकज गौड़ समेत चार अफसर डिमोट

सुप्रीम कोर्ट ने चार इंजीनियरों का B&R विभाग में अवशोषण रद्द किया
प्रदीप अत्री और पंकज गौड़ लंबे अरसे तक सोनीपत में दे चुके हैं सेवाएं
चारों को मूल विभाग में लौटाने और वरिष्ठता तय करने के आदेश


सोनीपत। करीब 18 साल से अधिक की सरकारी सेवा के बाद हरियाणा के चार इंजीनियरों की सेवा व्यवस्था को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। मामला लोक निर्माण विभाग (B&R) में डेपुटेशन के बाद स्थायी रूप से किए गए अवशोषण से जुड़ा था। सुप्रीम कोर्ट ने इस अवशोषण को नियमों के खिलाफ मानते हुए रद्द कर दिया है। इन चार अधिकारियों में प्रदीप अत्री और पंकज गौड़ भी शामिल हैं, जो लंबे अरसे तक सोनीपत में तैनात रह चुके हैं और यहां सेवाएं दे चुके हैं

शीर्ष अदालत के इस फैसले के बाद चारों अधिकारियों को अब उनके मूल विभाग Development and Panchayat Department, Haryana में वापस जाना होगा। अदालत ने उनकी मूल विभाग में सेवा संबंधी स्थिति बहाल करने के साथ SDO (Panchayati Raj) cadre में वरिष्ठता निर्धारित करने के भी निर्देश दिए हैं।

मामला Hemant Kumar & Ors. v. State of Haryana & Connected Matters से जुड़ी सिविल अपीलों का है। Justice Manoj Misra और Justice Ujjal Bhuyan की पीठ ने मामले की सुनवाई की। फैसला Justice Ujjal Bhuyan ने लिखा।

सोनीपत में लंबे समय तक रहे प्रदीप अत्री और पंकज गौड़

इस पूरे मामले में प्रदीप अत्री और पंकज गौड़ का सोनीपत से लंबा जुड़ाव रहा है। दोनों काफी लंबे अरसे तक सोनीपत में रहे और यहां अपनी सेवाएं दीं। अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले में दोनों का नाम उन चार अधिकारियों में शामिल है, जिनका B&R विभाग में किया गया स्थायी अवशोषण रद्द कर दिया गया है।

यानी जिन अधिकारियों ने लंबे समय तक अलग-अलग जिम्मेदारियों के साथ सोनीपत में काम किया, उनकी सेवा को लेकर अब शीर्ष अदालत ने मूल विभाग में वापसी का रास्ता तय कर दिया है। हालांकि, अदालत का फैसला उनके सोनीपत कार्यकाल पर नहीं, बल्कि B&R विभाग में उनके absorption की वैधानिकता पर है।

डेपुटेशन के बाद स्थायी अवशोषण पर उठे थे सवाल

चारों अधिकारियों को उनके मूल विभाग से PW (B&R) Department में डेपुटेशन पर लाया गया था। बाद में उन्हें इसी विभाग में स्थायी रूप से अवशोषित कर लिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने इसी प्रक्रिया को नियमों के अनुरूप नहीं माना।

अदालत ने Punjab Service of Engineers, Class II, P.W.D. (B&R Branch) Rules, 1965 का हवाला देते हुए कहा कि कैडर में पदों को भरने की प्रक्रिया पहले से निर्धारित थी। नियमों के तहत 50 प्रतिशत पद direct recruitment और 50 प्रतिशत पद promotion से भरे जाने थे।

ऐसे में डेपुटेशन के जरिए अधिकारियों को लाकर बाद में उन्हें स्थायी रूप से उसी विभाग में अवशोषित करने की प्रक्रिया निर्धारित भर्ती व्यवस्था के अनुरूप नहीं पाई गई।

Rule 10 भी बना फैसले का अहम आधार

सुप्रीम कोर्ट ने Rule 10 में दिए गए “special circumstances” के प्रावधान पर भी विस्तार से विचार किया। अदालत ने कहा कि सामान्य प्रशासनिक जरूरत, रिक्त पद या कर्मचारियों की कमी को ऐसी विशेष परिस्थिति नहीं माना जा सकता, जिसके आधार पर निर्धारित भर्ती नियमों को दरकिनार कर दिया जाए।

यानी विभाग में जरूरत होने भर से किसी अधिकारी को निर्धारित भर्ती प्रक्रिया के बाहर स्थायी रूप से जगह नहीं दी जा सकती।

18 साल की सेवा भी नहीं बनी अवशोषण बचाने का आधार

इस मामले में अधिकारियों की लंबी सेवा का मुद्दा भी महत्वपूर्ण था। 18 साल से अधिक समय तक सेवा करने के कारण पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने 15 मार्च 2023 के अपने फैसले में उन्हें राहत दी थी।

हाई कोर्ट ने लंबे सेवाकाल और परिस्थितियों को देखते हुए उनकी सेवा जारी रखने का रास्ता अपनाया था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस दृष्टिकोण को स्वीकार नहीं किया।

शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि लंबे समय तक सेवा करने से नियमों के खिलाफ हुई नियुक्ति या अवशोषण अपने आप वैध नहीं हो जाता। अदालत के मुताबिक शुरुआत में अपनाई गई प्रक्रिया ही अगर निर्धारित नियमों के विपरीत है तो बाद की लंबी सेवा उस कमी को खत्म नहीं कर सकती।

प्रदीप अत्री के मामले में क्या कहा गया

सुप्रीम कोर्ट ने चारों अधिकारियों के मामलों को एक जैसा मानने के बजाय उनकी अलग-अलग परिस्थितियों पर भी विचार किया।

प्रदीप अत्री और प्रवीण चौधरी के मामले में उनकी डेपुटेशन और उसके बाद हुए अवशोषण की प्रक्रिया पर अदालत ने गंभीरता से विचार किया। प्रदीप अत्री के मामले में यह तथ्य सामने आया कि उस समय वह अपने मूल विभाग में probation period में थे।

फैसले में यह भी उल्लेख किया गया कि जिस पद पर बाद में transfer के जरिए उन्हें प्रवेश मिला, उसके लिए आयोजित direct recruitment test में वह सफल नहीं हुए थे।

पंकज गौड़ के मामले में अलग स्थिति

पंकज गौड़ और अरुण भाटिया के मामले में अदालत ने उनकी शुरुआती requisitioned deputation को पूरी तरह अवैध नहीं माना। इसे irregular माना गया। हालांकि, बाद में किया गया permanent absorption नियमों की कसौटी पर खरा नहीं उतरा।

सुप्रीम कोर्ट ने इसी स्थायी अवशोषण को रद्द कर दिया। अदालत के सामने यह भी आया कि इस प्रक्रिया के पीछे वास्तविक सार्वजनिक आवश्यकता के बजाय राजनीतिक सिफारिशों की भूमिका थी।

अब मूल विभाग में वापस जाएंगे चारों अधिकारी

सुप्रीम कोर्ट ने चारों अधिकारियों को Development and Panchayat Department, Haryana में वापस भेजने के निर्देश दिए हैं।

अदालत ने कहा कि B&R विभाग में किया गया अवशोषण रद्द होने के साथ उनके मूल विभाग में मौजूद lien revive होगा। इसके अलावा उनकी वरिष्ठता SDO (Panchayati Raj) cadre में निर्धारित की जाएगी।

अदालत ने वरिष्ठता को लेकर भी निर्देश दिया है कि उनकी स्थिति उन अधिकारियों के क्रम के अनुसार तय की जाए, जो मूल कैडर में उनसे junior थे।

फैसले से सरकारी नियुक्तियों को लेकर साफ संदेश

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का व्यापक संदेश सरकारी सेवा में भर्ती, डेपुटेशन और अवशोषण की निर्धारित प्रक्रिया को लेकर है। अदालत ने साफ कर दिया कि प्रशासनिक जरूरत, रिक्त पद, लंबा सेवाकाल या सहानुभूति जैसे आधारों पर भर्ती नियमों को दरकिनार नहीं किया जा सकता।

सोनीपत के लिहाज से इस मामले में प्रदीप अत्री और पंकज गौड़ का लंबे समय तक यहां रहना अहम तथ्य है। दोनों का सोनीपत में लंबा कार्यकाल रहा है। अब सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद दोनों समेत चारों अधिकारियों को अपने मूल विभाग में लौटना होगा और उनकी सेवा संबंधी वरिष्ठता उसी कैडर के नियमों के मुताबिक तय होगी।