लावारिस शवों के लिए कंधा बने शांतनु कुमार, 30 साल में 5018 शवों का करवाया अंतिम संस्कार

हमीरपुर के शांतनु कुमार करीब 30 साल में 5018 लावारिस शवों का अंतिम संस्कार करवा चुके हैं। हरिद्वार में अस्थि विसर्जन और पिंडदान भी करवाते हैं।

शांतनु कुमार 30 साल में 5018 लावारिस शवों का अंतिम संस्कार करवा चुके हैं
➤ हरिद्वार ले जाकर अस्थि विसर्जन, पिंडदान और ब्राह्मण भोज का खर्च भी खुद उठाते हैं
➤ पद्मश्री पुरस्कार के लिए चार लोगों ने आगे भेजा नाम, वर्षों की सेवा को मिला सम्मान

हमीरपुर। हिमाचल प्रदेश में समाजसेवा के नाम पर प्रचार और दिखावे के कई उदाहरण देखने को मिलते हैं, लेकिन निस्वार्थ भाव से मानवता की सेवा करने वाले लोग कम ही नजर आते हैं। हमीरपुर में मूल रूप से कोलकाता, बंगाल के रहने वाले शांतनु कुमार करीब तीन दशक से ऐसी ही अनूठी सेवा में जुटे हुए हैं। हिमाचल में छोटी-सी दुकान चलाने वाले शांतनु कुमार उन लोगों के लिए कंधा बनते हैं, जिनके अंतिम सफर में उनका अपना कोई मौजूद नहीं होता।

शांतनु कुमार पिछले करीब 30 वर्षों से लावारिस शवों का अंतिम संस्कार करवाते आ रहे हैं। उनका कहना है कि अब तक वह करीब 5018 लावारिस शवों का अंतिम संस्कार करवा चुके हैं। उनकी यह सेवा केवल अंतिम संस्कार तक सीमित नहीं रहती, बल्कि वह मृतकों की अस्थियों को अपने खर्चे पर हरिद्वार लेकर जाते हैं और वहां हिंदू रीति-रिवाजों एवं शास्त्रों के अनुसार पिंडदान और अस्थि विसर्जन भी करवाते हैं।

अंतिम संस्कार के बाद अस्थियों को हरिद्वार ले जाते हैं शांतनु कुमार

शांतनु कुमार के मुताबिक, लावारिस शवों का अंतिम संस्कार करवाने के बाद वह मृतकों की अस्थियां अपने खर्चे पर हरिद्वार ले जाते हैं। हर की पौड़ी स्थित ब्रह्मकुंड में हिंदू रीति-रिवाजों और शास्त्रों के अनुसार पिंडदान और अस्थि विसर्जन करवाया जाता है।

इस दौरान वह 11 ब्राह्मणों को भोजन करवाने के साथ-साथ वस्त्र दान भी करते हैं। इस तरह उनका प्रयास रहता है कि जिन लोगों का अंतिम सफर अपने परिवार के किसी सदस्य के बिना हुआ, उन्हें धार्मिक परंपराओं के अनुसार अंतिम सम्मान भी मिल सके।

नेपाल त्रासदी में दिवंगत आत्माओं की शांति के लिए भी करवाया पिंडदान

शांतनु कुमार ने बताया कि इस बार नेपाल में हुई त्रासदी में करीब 1500 लोगों की मौत की सूचना के बाद उन्होंने हरिद्वार में उन दिवंगत आत्माओं की शांति के लिए भी पिंडदान करवाया। उनका कहना है कि यह कार्य उन्होंने मृतकों की आत्मा की शांति की भावना से किया।

उनके लिए यह सेवा किसी एक व्यक्ति या परिवार तक सीमित नहीं है। जिन लोगों का कोई अपना अंतिम संस्कार करने वाला नहीं है, उनके लिए वह आगे आते हैं और अपनी क्षमता के अनुसार अंतिम संस्कार की प्रक्रिया पूरी करवाने का प्रयास करते हैं।

गरीब परिवारों की अस्थि विसर्जन में भी करते हैं मदद

शांतनु कुमार ने बताया कि यदि कोई गरीब परिवार अपने परिजन की अस्थियां लेकर हरिद्वार पहुंचता है और आर्थिक परेशानी के कारण अस्थि विसर्जन करवाने में असमर्थ होता है, तो वह अपनी ओर से मदद करने का प्रयास करते हैं।

जरूरत पड़ने पर वह संबंधित लोगों से संपर्क कर खर्च माफ करवाने की व्यवस्था भी करवाते हैं। उनका प्रयास रहता है कि आर्थिक परेशानी किसी परिवार के धार्मिक संस्कारों में बाधा न बने और जरूरतमंद लोगों को यथासंभव सहायता मिल सके।

पद्मश्री पुरस्कार के लिए भी आगे भेजा गया नाम

करीब तीन दशक से इस सेवा में जुटे शांतनु कुमार ने बताया कि इस बार पद्मश्री पुरस्कार के लिए भी उनका नाम आगे भेजा गया है। उन्होंने कहा कि कुल चार लोगों ने उनका नाम आगे बढ़ाया है।

इसके लिए उन्होंने सभी का आभार जताया। शांतनु कुमार ने कहा कि जिन लोगों ने उनकी वर्षों की सेवा को सम्मान के योग्य समझा, वह उनके प्रति दिल की गहराइयों से धन्यवाद व्यक्त करते हैं।

बिना प्रचार की चाह के वर्षों से जारी है सेवा

शांतनु कुमार की कहानी ऐसे समय में सामने आती है, जब समाजसेवा के कई कामों में प्रचार और दिखावे का पहलू भी देखने को मिलता है। इसके विपरीत, वह करीब तीन दशक से लावारिस शवों को अंतिम सम्मान दिलाने का दावा करते हुए अपनी सेवा जारी रखे हुए हैं।

हमीरपुर में छोटी-सी दुकान चलाने वाले शांतनु कुमार का यह कार्य उन लोगों के लिए सहारा बनता है, जिनके अंतिम सफर में उनके परिवार या परिचित मौजूद नहीं होते। अंतिम संस्कार से लेकर अस्थियों को हरिद्वार ले जाने, पिंडदान और अस्थि विसर्जन करवाने तक उनकी सेवा मानवता और संवेदनशीलता से जुड़ी हुई है।

5018 लावारिस शवों के अंतिम संस्कार का दावा और करीब 30 वर्षों से जारी यह सेवा उनके जीवन के उस पक्ष को सामने लाती है, जिसमें उन्होंने उन मृतकों के लिए जिम्मेदारी उठाई, जिनके अंतिम समय में उनका अपना कोई साथ देने वाला नहीं था।