2.25 किलो चांदी, गोल्ड प्लेटिंग और 108 लाल नग… जानिए मां की पोशाक की खासियत, कुरुक्षेत्र के इस शक्तिपीठ में माता सती के टखने से जुड़ी है मान्यता

कुरुक्षेत्र के श्री देवीकूप मां भद्रकाली मंदिर में नवरात्र के पहले दिन 2.25 किलो चांदी से बनी गोल्ड प्लेटेड पोशाक माता को अर्पित की गई।

2.25 किलो चांदी, गोल्ड प्लेटिंग और 108 लाल नग… जानिए मां की पोशाक की खासियत, कुरुक्षेत्र के इस शक्तिपीठ में माता सती के टखने से जुड़ी है मान्यता

➤ श्री देवीकूप मां भद्रकाली मंदिर में पहले नवरात्र पर माता को 2.25 किलो चांदी से बनी गोल्ड प्लेटेड पोशाक पहनाई गई

➤ गुजरात के तीन कारीगरों ने 15 दिन में तैयार की पोशाक, डिजाइन में मां के आठ रूपों और त्रिशक्ति के प्रतीक शामिल

➤ 52 शक्तिपीठों में शामिल मंदिर को लेकर मान्यता, यहां माता सती का दायां टखना गिरा था


कुरुक्षेत्र। हरियाणा के कुरुक्षेत्र स्थित श्री देवीकूप मां भद्रकाली मंदिर में नवरात्र के पहले दिन माता को चांदी से बनी विशेष पोशाक अर्पित की गई। करीब 2.25 किलो चांदी से तैयार इस पोशाक पर गोल्ड प्लेटिंग की गई है, जिससे यह सोने जैसी चमकती है। पोशाक को माता के स्वरूप, धार्मिक मान्यताओं और प्रतीकों को ध्यान में रखकर डिजाइन किया गया है। मंदिर के पीठाध्यक्ष पंडित सतपाल शर्मा की पुत्रवधू निकुंज शर्मा ने परिवार की सहमति से इसे तैयार करवाया। उनके अनुसार, गुजरात के एक मंदिर में भगवान को इसी तरह की पोशाक पहने देखने के बाद उनके मन में मां भद्रकाली के लिए भी ऐसी पोशाक बनवाने का विचार आया। उसी रात सपने में माता को भी इसी रूप में देखने के बाद उन्होंने इस विचार को आगे बढ़ाया। गुजरात के तीन कारीगरों ने करीब 15 दिन की मेहनत से पोशाक तैयार की। रविवार को पहले नवरात्र के अवसर पर इसे माता के चरणों में अर्पित किया गया। मंदिर से जुड़ी धार्मिक मान्यता के अनुसार, यह स्थान 52 शक्तिपीठों में शामिल है और यहां माता सती का दायां टखना गिरा था।

चांदी की प्लेट पर उकेरी गई बारीक कारीगरी, फिर की गई गोल्ड प्लेटिंग

निकुंज शर्मा ने बताया कि माता की पोशाक बनाने के लिए पहले इसका सांचा तैयार किया गया। इसके बाद चांदी की प्लेट पर बारीक डिजाइन उकेरे गए और अंत में उस पर गोल्ड प्लेटिंग की गई। पोशाक को अलग-अलग हिस्सों को जोड़कर बनाने के बजाय चांदी की प्लेट पर ही तराशा गया है। इसमें पत्तियों के कई तरह के डिजाइन बनाए गए हैं, जो प्रकृति को दर्शाते हैं।

पोशाक की बनावट और उस पर की गई कारीगरी इसे विशेष रूप देती है। इसे तैयार करने वाले कारीगरों ने ओमान और दुबई जैसे देशों में भी कारीगरी सीखी है। इसी अनुभव का इस्तेमाल पोशाक पर बारीक डिजाइन उकेरने में किया गया।

मां के आठ रूपों और त्रिशक्ति के प्रतीकों से सजाई गई पोशाक

निकुंज शर्मा के अनुसार, पोशाक के डिजाइन और उसमें लगाए गए नगों को मां भद्रकाली के स्वरूप से जोड़कर तैयार किया गया है। उन्होंने दावा किया कि उत्तर भारत में किसी मंदिर में इस तरह की चांदी की गोल्ड प्लेटेड पोशाक पहली बार अर्पित की गई है।

मां भद्रकाली के श्याम रंग को ध्यान में रखते हुए पोशाक के ऊपरी और निचले हिस्से, बेल्ट तथा घेरे में नीले नग लगाए गए हैं। वहीं, इसके अलग-अलग हिस्सों में आठ-आठ लाल नग जड़े गए हैं, जिन्हें मां काली के आठ रूपों का प्रतीक बताया गया है।

पोशाक में तीन मोती भी लगाए गए हैं, जो मां लक्ष्मी, मां सरस्वती और मां काली यानी त्रिशक्ति का प्रतिनिधित्व करते हैं। माता के कुंडलों में भी लाल रंग का इस्तेमाल किया गया है। इसके अलावा गले में 108 लाल नगों से बनी माला सजाई गई है। पोशाक पर दो मोर और एक मोर पंख का डिजाइन भी बनाया गया है।

मोर और मोर पंख के डिजाइन से जोड़ी गई भगवान श्रीकृष्ण की मान्यता

निकुंज शर्मा ने बताया कि मां भद्रकाली को भगवान श्रीकृष्ण की कुलदेवी माना जाता है। इसी धार्मिक मान्यता को ध्यान में रखते हुए पोशाक में मोर और मोर पंख से जुड़े आभूषण जैसे डिजाइन बनाए गए हैं। इस तरह पोशाक की सजावट में मां भद्रकाली के स्वरूप के साथ भगवान श्रीकृष्ण से जुड़ी मान्यता को भी स्थान दिया गया है।

पोशाक के विभिन्न हिस्सों में रंगों, नगों और धार्मिक प्रतीकों का इस्तेमाल सोच-समझकर किया गया है। परिवार की ओर से इसे पहले नवरात्र पर माता को अर्पित किया गया, जिससे मंदिर में दर्शन के लिए आने वाले श्रद्धालुओं के बीच यह पोशाक विशेष आकर्षण का केंद्र बनी।

52 शक्तिपीठों में शामिल है श्री देवीकूप मां भद्रकाली मंदिर

कुरुक्षेत्र का श्री देवीकूप मां भद्रकाली मंदिर धार्मिक आस्था के प्रमुख केंद्रों में शामिल है। मंदिर को 52 शक्तिपीठों में गिना जाता है। मान्यता है कि यहां माता सती का दायां टखना गिरा था। इसी घटना को इस स्थान के शक्तिपीठ के रूप में स्थापित होने से जोड़कर देखा जाता है।

मंदिर परिसर में माता की प्रतिमा के सामने एक पवित्र कुआं स्थित है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इसी स्थान पर माता सती का टखना गिरा था और उससे जुड़े प्रसंग के कारण यहां कुएं का महत्व माना जाता है। श्रद्धालुओं की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए मंदिर कमेटी ने इसे चारों ओर से कवर कर रखा है। भक्त दूर से ही इसके दर्शन करते हैं।

मंदिर में आने वाले श्रद्धालु माता के दर्शन कर अपनी मनोकामनाएं पूरी होने की प्रार्थना करते हैं। नवरात्र के अवसर पर मंदिर में विशेष धार्मिक गतिविधियां होती हैं और भक्त अपनी श्रद्धा के अनुसार माता को चढ़ावा अर्पित करते हैं।

श्रीकृष्ण, बलराम और पांडवों से भी जुड़ी हैं मंदिर की मान्यताएं

श्री देवीकूप मां भद्रकाली मंदिर से कई धार्मिक और पौराणिक मान्यताएं जुड़ी हुई हैं। मंदिर से संबंधित मान्यता के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण और बलराम का मुंडन संस्कार भी इसी स्थान पर हुआ था।

महाभारत युद्ध से जुड़ी एक अन्य मान्यता के मुताबिक, पांडवों ने युद्ध में विजय की कामना से यहां हवन-यज्ञ किया था। उन्होंने युद्ध में जीत मिलने पर अपने युद्ध के घोड़े माता को अर्पित करने का संकल्प लिया था। मान्यता है कि युद्ध में विजय के बाद पांडवों ने यहां घोड़े अर्पित किए। इसी प्रसंग को मंदिर में घोड़े चढ़ाने की परंपरा से जोड़कर देखा जाता है।

आज भी श्रद्धालु मंदिर में अपनी मनोकामना पूरी होने की प्रार्थना करते हुए मन्नत का धागा बांधते हैं। मनोकामना पूरी होने पर वे अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार माता के दरबार में चढ़ावा अर्पित करते हैं।

थानेसर में चार कूपों का मिलता है वर्णन

मंदिर के पीठाध्यक्ष पंडित सतपाल शर्मा ने बताया कि तीर्थांक पुराण में थानेसर के चार कूपों का वर्णन मिलता है। इनमें चंद्र कूप, रुद्र कूप, विष्णु कूप और देवी कूप शामिल हैं।

ब्रह्मसरोवर परिसर में स्थित चंद्र कूप को द्रौपदी कूप के नाम से भी जाना जाता है। स्थाण्वीश्वर महादेव मंदिर में रुद्र कूप और मां भद्रकाली मंदिर में देवी कूप का उल्लेख मिलता है।

पंडित सतपाल शर्मा के अनुसार, पिछले साल सन्निहित सरोवर के पास स्थित श्री लक्ष्मी-नारायण मंदिर में खुदाई के दौरान एक कूप मिला था। इसे विष्णु कूप होने का दावा किया जाता है। इसकी गहराई करीब 100 फुट बताई गई है। मान्यता है कि इसी कूप से सन्निहित सरोवर में जल आता होगा। फिलहाल इस कूप को भी कवर कर दिया गया है, ताकि श्रद्धालु सुरक्षित दूरी से इसके दर्शन कर सकें।