'मेट्रो और रेल सेवा हो बहाल, इंटरनेट भी बंद नहीं कर सकते', CJP प्रोटेस्ट के बीच सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश

CJP प्रदर्शन के बीच सुप्रीम कोर्ट ने मेट्रो-रेल सेवा सामान्य रखने, इंटरनेट बाधित नहीं करने, बैरिकेडिंग की समीक्षा और कथित गैरकानूनी हिरासत पर जवाब देने के निर्देश दिए।

'मेट्रो और रेल सेवा हो बहाल, इंटरनेट भी बंद नहीं कर सकते', CJP प्रोटेस्ट के बीच सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश

➤ मेट्रो और रेल सेवाएं सामान्य समय-सारणी के अनुसार चलाने का निर्देश

➤ बिना कानूनी आधार हिरासत पर रोक, बैरिकेडिंग की तत्काल समीक्षा के आदेश

➤ पुलिस कार्रवाई और पुराने आदेश के उल्लंघन के आरोपों पर अधिकारियों से जवाब तलब


नई दिल्ली। दिल्ली में CJP प्रदर्शन को लेकर मेट्रो स्टेशनों पर पाबंदियों, रेल सेवाओं, इंटरनेट बंद किए जाने और प्रदर्शनकारियों की हिरासत से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने रविवार को अहम निर्देश जारी किए। अदालत ने मेट्रो और रेल सेवाएं सामान्य रूप से चलाने, इंटरनेट सेवाओं को बाधित नहीं करने और शहर में लगाई गई बैरिकेडिंग की तत्काल समीक्षा करने को कहा। सुनवाई के दौरान पुलिस की कार्रवाई, कथित गैरकानूनी हिरासत, मोबाइल फोन जब्त किए जाने और प्रदर्शनकारियों की आवाजाही रोकने से जुड़े मुद्दे भी उठे। अदालत ने संबंधित अधिकारियों से जवाब मांगा और स्पष्ट किया कि कानून के दायरे से बाहर जाकर किसी व्यक्ति को हिरासत में नहीं लिया जा सकता।

मेट्रो और रेल सेवाएं सामान्य रखने का निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि मेट्रो सेवाएं सामान्य समय-सारणी के अनुसार संचालित हों और रेल तथा यातायात की आवाजाही बहाल रखी जाए। सुनवाई के दौरान मेट्रो स्टेशनों के प्रवेश और निकास पर लगाई गई पाबंदियों का मुद्दा उठा। अदालत ने दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन से उन स्टेशनों का नक्शा पेश करने को कहा, जहां प्रवेश या निकास बंद अथवा सीमित किया गया था।

सुनवाई में बताया गया कि शुरुआत में 57 मेट्रो स्टेशनों को बंद करने का प्रस्ताव था, जबकि बाद में 45 स्टेशनों पर प्रवेश और निकास सीमित किए जाने की जानकारी दी गई। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि सभी मेट्रो स्टेशन शनिवार रात करीब 10 बजे तक खोल दिए गए थे। उन्होंने यह भी कहा कि दिल्ली मेट्रो के कुल 303 स्टेशनों में से 45 पर ही प्रवेश और निकास सीमित किया गया था तथा सामान्य समय-सारणी के अनुसार 7,981 ट्रेन यात्राएं संचालित हुईं।

अदालत ने अधिकारियों से पाबंदियों के निर्णय और उसके प्रभाव का विवरण मांगा, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि किन स्टेशनों पर रोक लगाई गई थी और यात्रियों की आवाजाही पर इसका क्या असर पड़ा।

इंटरनेट सेवा बाधित नहीं करने का आदेश

सुनवाई के दौरान इंटरनेट सेवाओं पर रोक का मुद्दा भी प्रमुखता से उठा। अदालत ने निर्देश दिया कि इंटरनेट सेवाओं को बाधित नहीं किया जाए। सरकार की ओर से बताया गया कि इंटरनेट सेवा बहाल की जा चुकी है।

अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए कार्रवाई कानून के अनुसार होनी चाहिए। किसी संभावित अव्यवस्था के आधार पर लगाए जाने वाले प्रतिबंध भी कानूनी प्रावधानों के अनुरूप होने चाहिए। इंटरनेट सेवा और लोगों की आवाजाही पर रोक लगाने के मामले में संबंधित अधिकारियों को कानूनी आधार स्पष्ट करना होगा।

बैरिकेडिंग की समीक्षा और आवाजाही बहाल करने पर जोर

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में लगाए गए बैरिकेड्स की तत्काल समीक्षा करने का निर्देश दिया। अदालत के अनुसार, बैरिकेडिंग वहीं होनी चाहिए जहां इसकी वास्तविक जरूरत हो। लोगों की आवाजाही और यातायात को सामान्य बनाने पर भी जोर दिया गया।

सुनवाई के दौरान वकीलों ने आरोप लगाया कि प्रदर्शन के दौरान लोगों को अदालतों तक पहुंचने से रोका गया और कुछ वकीलों को हिरासत में लिया गया। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट और अन्य अदालतों तक पहुंच में अनावश्यक बाधा नहीं डालने की बात कही। परिसर के बाहर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 163 लागू होने से संबंधित सूचना बोर्ड का मुद्दा भी उठा। अदालत ने इस संबंध में जानकारी मांगी और बोर्ड हटाने का निर्देश दिया।

पुलिस कार्रवाई और हिरासत के आरोपों पर जवाब तलब

सुनवाई में वकीलों ने आरोप लगाया कि प्रदर्शन के दौरान कुछ लोगों के साथ पुलिस ने बल प्रयोग किया, मोबाइल फोन जब्त किए और कुछ मामलों में हिरासत की प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। कुछ वकीलों ने पुलिसकर्मियों के पहचान बैज नहीं होने और लोगों को दूर ले जाकर हिरासत में रखने के आरोप भी लगाए।

अदालत ने कहा कि पुलिस अधिकारियों द्वारा बिना बैज कार्रवाई करने, जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग और कथित गैरकानूनी हिरासत के आरोपों पर संबंधित पक्षों को जवाब देना होगा। सुनवाई में हिरासत में लिए गए लोगों की संख्या को लेकर भी दावे रखे गए, लेकिन इस संबंध में अलग-अलग पक्षों की बातों की पुष्टि और सरकारी जवाब महत्वपूर्ण होंगे।

अदालत ने स्पष्ट किया कि कानून के मुताबिक कार्रवाई के अलावा किसी को हिरासत में नहीं लिया जा सकता। प्रदर्शन के दौरान पुलिस की कार्रवाई की वैधता और हिरासत की परिस्थितियों पर संबंधित अधिकारियों से जवाब मांगा गया है।

पुराने आदेश के उल्लंघन पर कारण बताओ नोटिस

सुप्रीम कोर्ट ने 9 अक्टूबर को दिए गए अपने आदेश के कथित उल्लंघन को लेकर संबंधित अधिकारियों को कारण बताओ नोटिस जारी किया। अदालत ने पूछा कि उनके खिलाफ अवमानना की कार्यवाही क्यों न शुरू की जाए। अधिकारियों को हलफनामा दाखिल कर अपना पक्ष रखने को कहा गया।

अदालत ने पहले दिए गए निर्देशों का उल्लेख करते हुए कहा कि मेट्रो स्टेशनों को बंद करने के फैसले पर दोबारा विचार करने, यातायात को लेकर नई सलाह जारी करने और आदेश के अनुपालन की रिपोर्ट देने के निर्देश दिए गए थे। अब संबंधित अधिकारियों को यह स्पष्ट करना होगा कि इन निर्देशों का पालन किस तरह किया गया।

शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार पर भी चर्चा

सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल सहित वकीलों ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार और लोगों की आवाजाही पर लगाई गई पाबंदियों का मुद्दा उठाया। दूसरी ओर, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने प्रदर्शन की अनुमति और सुरक्षा व्यवस्था से संबंधित पक्ष अदालत के सामने रखे।

अदालत ने कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार महत्वपूर्ण है, लेकिन प्रदर्शन कानून के दायरे में होना चाहिए। साथ ही, सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर लगाए गए प्रतिबंधों की वैधता और उनकी जरूरत की भी समीक्षा की जा सकती है।

फोन जब्त किए जाने से जुड़े मुद्दे पर अदालत ने संबंधित पक्षों को आवेदन दाखिल करने को कहा। मामले से जुड़े पक्षों की आगे की सुनवाई मंगलवार को निर्धारित की गई है। अदालत ने हिरासत, पुलिस कार्रवाई और पूर्व आदेश के अनुपालन से संबंधित मामलों पर जवाब मांगा है।

CJP प्रदर्शन मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर आयोजित किया गया था। प्रदर्शन के दौरान हुई पुलिस कार्रवाई और सार्वजनिक परिवहन पर लगाए गए प्रतिबंधों को लेकर उठे सवालों पर अब सुप्रीम कोर्ट की आगे की सुनवाई महत्वपूर्ण होगी।