12 मन सूखी लकड़ी ही मेरी प्रॉपर्टी है’, नाना पाटेकर ने कहा था- मरने के बाद मेरी तस्वीर मत लगाना

नाना पाटेकर ने 2023 के इंटरव्यू में मौत और जिंदगी पर बेबाक बातें की थीं। उन्होंने 12 मन सूखी लकड़ी, तस्वीर न लगाने और मां से मिलने की बात कही थी।

12 मन सूखी लकड़ी ही मेरी प्रॉपर्टी है’, नाना पाटेकर ने कहा था- मरने के बाद मेरी तस्वीर मत लगाना

➤ मौत को लेकर नाना पाटेकर की सोच बेहद साफ और बेबाक थी
➤ कहा था- 12 मन सूखी लकड़ी ही मेरी आखिरी प्रॉपर्टी है, इसी में जलाना
➤ निधन के बाद तस्वीर न लगाने और पूरी तरह भूल जाने की भी कही थी बात


दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनकी फिल्में, संवाद और बेबाक इंटरव्यू लंबे समय तक लोगों के बीच याद किए जाएंगे। जिंदगी को लेकर जितने स्पष्ट नाना पाटेकर थे, उतनी ही बेबाकी से उन्होंने मौत के बारे में भी बात की थी। वर्ष 2023 में फिल्म द वैक्सीन वॉर के दौरान दिए गए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि उन्हें मृत्यु पर विश्वास है और इंसान इस दुनिया से आखिरकार क्या लेकर जाता है, इसका जवाब बेहद छोटा है। उन्होंने अपनी अंतिम यात्रा को लेकर यहां तक कहा था कि 12 मन लकड़ी ही उनकी पूरी प्रॉपर्टी है और उसी के साथ वह इस दुनिया से जाएंगे।

नाना पाटेकर ने उस बातचीत में जिंदगी में चीजें जोड़ते रहने की सोच पर भी सवाल उठाया था। उनका कहना था कि जिन्हें लगता है कि वे कभी नहीं मरेंगे, वे लगातार चीजें जमा करते रहते हैं। इसके उलट वह मृत्यु को जीवन की सच्चाई मानते थे और इसी वजह से उन्हें ज्यादा से ज्यादा चीजें बटोरने में कोई खास दिलचस्पी नहीं थी।

‘12 मन लकड़ी ही मेरी पूरी प्रॉपर्टी है’

जब नाना पाटेकर से पूछा गया कि फिल्म इंडस्ट्री में इतने लंबे समय तक रहने के बावजूद ग्लैमर और शोहरत ने उनके स्वभाव को क्यों नहीं बदला, तो उन्होंने अपने अंदाज में जवाब दिया था। उन्होंने कहा था कि उन्हें पता है कि एक दिन उन्हें जाना है और अंत में 12 मन लकड़ी ही उनके साथ जाएगी। उनके लिए यही उनकी आखिरी प्रॉपर्टी थी।

नाना का यह जवाब उनके जीवन दर्शन को भी सामने लाता था। करोड़ों की कमाई, लोकप्रियता और लंबे फिल्मी करियर के बावजूद वह बार-बार इस बात की ओर लौटते थे कि आखिर में इंसान के पास बचता क्या है।

‘मुझे गीली लकड़ी में मत जलाना’

मौत और अंतिम संस्कार की बात करते हुए नाना पाटेकर ने अपने अंदाज में एक ऐसी बात कही थी, जिसने उस समय लोगों का ध्यान खींचा था। उन्होंने बताया था कि उन्होंने सूखी लकड़ियां रखी हैं और कहा है कि अंतिम संस्कार उसी लकड़ी से किया जाए।

उन्होंने गीली लकड़ी इस्तेमाल न करने की वजह भी अपने खास अंदाज में बताई थी। उनका कहना था कि गीली लकड़ी से धुआं उठेगा और आसपास मौजूद लोगों की आंखों में पानी आ जाएगा। ऐसे में उन्हें यह गलतफहमी हो सकती है कि लोग उनके लिए रो रहे हैं। उनका संदेश साफ था कि मरते वक्त भी किसी तरह की गलतफहमी नहीं होनी चाहिए।

मौत जैसे गंभीर विषय पर भी नाना का यह अंदाज उनकी बेबाक और अलग सोच को दिखाता था। वह कठिन बात को भी कभी-कभी ऐसे तरीके से कहते थे कि सामने वाला पहले मुस्कुराए और फिर उस बात की गहराई पर सोचने लगे।

‘मर जाऊंगा तो मेरी तस्वीर भी मत लगाना’

नाना पाटेकर ने अपने निधन के बाद की जिंदगी को लेकर भी एक बेहद स्पष्ट इच्छा जाहिर की थी। उन्होंने कहा था कि इंसान के जाने के बाद कुछ दिन लोग उसे याद करते हैं, लेकिन धीरे-धीरे जिंदगी आगे बढ़ जाती है।

इसी सोच के चलते उन्होंने कहा था कि उनकी तस्वीर भी न लगाई जाए और उन्हें पूरी तरह भूल जाएं। उनके लिए यह बात किसी निराशा से ज्यादा जिंदगी की वास्तविकता को स्वीकार करने जैसी थी। वह मानते थे कि कोई भी व्यक्ति हमेशा के लिए इस दुनिया में नहीं रहता और समय के साथ यादें भी धुंधली पड़ जाती हैं।

‘मृत्यु के बाद मां से मिलने जाऊंगा’

नाना पाटेकर के लिए मृत्यु केवल जीवन का अंत नहीं थी। उन्होंने अपने परिवार और मां से जुड़े भावनात्मक संदर्भ में कहा था कि उन्हें आज भी लगता है कि उनकी मां कहीं न कहीं मौजूद हैं और मृत्यु के बाद वह उनसे मिलने जाएंगे।

उन्होंने बताया था कि वह सात भाई-बहन थे और उनके भाई-बहनों में से बाकी सभी गुजर चुके थे। उनके माता-पिता भी इस दुनिया में नहीं थे। ऐसे में उनके लिए अपने परिवार के लोगों से दोबारा मिलने की कल्पना मृत्यु के डर से अलग एक भावनात्मक रिश्ता थी।

उनकी यह सोच बताती है कि मौत को लेकर उनके विचार सिर्फ दार्शनिक नहीं थे, बल्कि परिवार की यादों और निजी अनुभवों से भी जुड़े हुए थे।

‘प्रहार’ से निर्देशन की दुनिया में रखा कदम

नाना पाटेकर केवल अभिनेता ही नहीं थे। वर्ष 1991 में आई फिल्म ‘प्रहार: द फाइनल अटैक’ के जरिए उन्होंने निर्देशन की दुनिया में भी कदम रखा। इस फिल्म में उन्होंने अभिनय करने के साथ-साथ लेखन और निर्देशन की जिम्मेदारी भी संभाली थी।

फिल्म में उन्होंने मेजर चौहान का किरदार निभाया था। सेना की पृष्ठभूमि वाले इस किरदार के जरिए फिल्म में देश और समाज से जुड़े गंभीर विषयों को सामने रखा गया था।

इससे पहले ‘परिंदा’ में उनके अभिनय ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई थी। बाद में ‘अब तक छप्पन’ में एनकाउंटर स्पेशलिस्ट का किरदार हो या ‘तिरंगा’ में पुलिस अधिकारी का रोल, नाना ने अलग-अलग तरह के किरदारों को अपनी विशिष्ट शैली दी।

‘वजूद’ का सिरफिरा आशिक भी रहा यादगार

नाना पाटेकर की अभिनय क्षमता का एक अलग रंग 1998 की फिल्म ‘वजूद’ में भी दिखाई दिया। फिल्म में उन्होंने एक ऐसे आशिक का किरदार निभाया था, जो प्यार में पूरी तरह डूबा हुआ नजर आता है।

माधुरी दीक्षित के साथ उनका यह किरदार और फिल्म के भावनात्मक संवाद दर्शकों के बीच लंबे समय तक चर्चा में रहे। नाना की खासियत यही थी कि वह एक ही तरह के किरदार में बंधकर नहीं रहे।

‘क्रांतिवीर’ से ‘वेलकम’ तक हर रंग में दिखे नाना

नाना पाटेकर ने अपने लंबे करियर में गंभीर, सामाजिक, नकारात्मक, पुलिस, सैन्य और कॉमेडी से जुड़े कई किरदार निभाए। ‘क्रांतिवीर’ में प्रताप का किरदार उनके करियर के यादगार अभिनय में शामिल रहा। इस फिल्म के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और फिल्मफेयर पुरस्कार मिला।

‘परिंदा’ में अन्ना सेठ के किरदार ने उन्हें खलनायक के रूप में अलग पहचान दी। ‘प्रहार: द फाइनल अटैक’ में मेजर प्रताप चौहान और ‘तिरंगा’ में शिवाजीराव वाघले के किरदार भी दर्शकों के बीच लोकप्रिय रहे।

इसके बाद ‘अब तक छप्पन’ में साधु आगाशे के रूप में उन्होंने एक शांत लेकिन प्रभावशाली पुलिस अधिकारी का किरदार निभाया। वहीं ‘वेलकम’ में उदय शेट्टी के रूप में उनकी कॉमेडी ने दर्शकों का एक अलग वर्ग जीता।

‘अपहरण’ और ‘राजनीति’ जैसी फिल्मों में भी उन्होंने अलग-अलग तरह के किरदार निभाए। उनके करियर की यही विविधता उन्हें उन अभिनेताओं में शामिल करती है, जिनके किरदार सिर्फ पर्दे तक सीमित नहीं रहते।

नाना की बातों में दिखती थी जिंदगी की सच्चाई

नाना पाटेकर के पुराने इंटरव्यू का यह हिस्सा अब उनके निधन के बाद फिर चर्चा में है। उनकी बातें सुनने पर लगता है कि वह शोहरत और मौत दोनों को एक ही नजर से देखते थे। वह जानते थे कि लोकप्रियता स्थायी नहीं है और इंसान के जाने के बाद दुनिया अपने रास्ते पर आगे बढ़ती रहती है।

उन्होंने अपने लिए जो सबसे बड़ी ‘प्रॉपर्टी’ बताई थी, वह धन-दौलत या कोई बड़ी संपत्ति नहीं, बल्कि 12 मन लकड़ी थी। उन्होंने अपनी तस्वीर तक न लगाने की बात कही थी।

आज उनकी फिल्में, उनके किरदार और उनके संवाद लोगों के बीच मौजूद हैं। लेकिन शायद नाना पाटेकर की सबसे बड़ी पहचान यही रहेगी कि उन्होंने जिंदगी को जिस तरह जिया, उसी तरह मौत की सच्चाई पर भी बिना लाग-लपेट के बात की।