महिलाओं का जीवन सिर्फ शादी और पति के लिए ही नहीं।। खतना प्रथा पर सुप्रीम कोर्ट ने उठाए सवाल

देश विशेष स्टोरी
दिल्ली/ पानीपत, 30 जुलाई।

सुप्रीम कोर्ट ने दाऊदी बोहरा मुस्लिम समुदाय में प्रचलित नाबालिग लड़कियों का खतना किए जाने की प्रथा पर सवाल उठाए हैं। सोमवार को खतना के विरोध में दाखिल याचिका पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि महिलाओं का खतना सिर्फ इसलिए नहीं किया जा सकता कि उन्हें शादी करनी है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि महिलाओं का जीवन सिर्फ शादी और पति के लिए नहीं होता। सुप्रीम कोर्ट से महिलाओं का खतना किए जाने की प्रथा पर भारत में पूरी तरह से बैन लगाने की मांग की गई है।

सोमवार को कोर्ट ने कहा कि शादी के अलावा भी महिलाओं का दायित्व है। इस तरह की प्रथा महिलाओं की निजता के अधिकार का उल्लंघन है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह लैंगिक संवेदनशीलता का मामला है और स्वास्थ्य ने लिए खतरनाक भी हो सकता है। सर्वोच्च अदालत ने आगे कहा कि यह किसी भी व्यक्ति के पहचान का केंद्र बिंदु होता है और यह कृत्य ( खतना) उसके पहचान के खिलाफ है।

महिला पर ही क्यों पति को खुश करने का दायित्व ? 

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस तरफ का कृत्य एक औरत को आदमी के लिए तैयार करने के मकसद से किया जाता है, जैसे वह जानवर हो। कोर्ट ने सवाल पूछते हुए कहा कि किसी महिला पर ही यह दायित्व क्यों हो कि वह अपने पति को खुश करे। आपको बता दें कि केंद्र सरकार ने भी उस याचिका का समर्थन किया है, जिसमें दाऊदी बोहरा मुस्लिम समुदाय की नाबालिग लड़कियों का खतना किए जाने की प्रथा का विरोध किया गया है।

पॉस्को के तहत अपराध है प्राइवेट पार्ट को छूना

वहीं, ऐडवोकेट इंदिरा जयसिंह ने याचिकाकर्ता की तरफ से कहा कि किसी भी आपराधिक कृत्य की सिर्फ इसलिए इजाजत नहीं दी जा सकती है क्योंकि वह प्रथा है। उन्होंने कहा कि प्राइवेट पार्ट को छूना पॉस्को के तहत अपराध है। सुप्रीम कोर्ट में इस मसले पर मंगलवार को भी सुनवाई जारी रहेगी। पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि धर्म के नाम पर कोई भी किसी महिला के जननांग को कैसे छू सकता है? जननांग को विकृत करना महिलाओं की गरिमा और सम्मान के खिलाफ है।

सरकार बैन के समर्थन में 

केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि धर्म की आड़ में लड़कियों का खतना करना जुर्म है और वह इस पर रोक का समर्थन करता है। इससे पहले केंद्र सरकार की ओर से कहा जा चुका है कि इसके लिए सात साल तक कैद की सजा का प्रावधान भी है। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने दाऊदी बोहरा मुस्लिम समाज में प्रचलित इस प्रथा पर रोक लगाने वाली याचिका पर केरल और तेलंगाना सरकारों को भी नोटिस जारी किया था। याचिकाकर्ता और सुप्रीम कोर्ट में वकील सुनीता तिहाड़ की याचिका पर कोर्ट में सुनवाई चल रही है। तिहाड़ ने कहा कि भारत ने संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार घोषणा पत्र पर भी हस्ताक्षर किए हैं।


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सिटी तहलका डेस्क

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