लोकसभा चुनाव के परिणाम तय करेंगे हरियाणा भाजपा का भविष्य ।। सारा गेम टिका है मनोविज्ञान पर

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हरियाणा भाजपा का भविष्य का सारा गेम मनोवैज्ञान पे टिका है। सही कहे तो प्रदेश भाजपा का भाग्य केंद्र सरकार के भविष्य के साथ टैग हो गया है। हरियाणा छोटा लेकिन राजनीतिक रूप से जागरूक लोगो का प्रदेश है। जब भी हरियाणा में विधानसभा के चुनाव लोकसभा के तुरंत बाद हुए तो, जिस दल की केंद्र में सरकार बनी उस दल या गठबन्धन की ही हरियाणा में सरकारें बनी हैं। हरियाणा में भाजपा सरकार के भविष्य के बारे में तरह-२ की अटकलें लगाई जा रही हैं लेकिन एक बात तय है कि यदि केंद्र में भाजपा पुनःदमखम के साथ वापसी करती है तो उस अवस्था मे भाजपा को हरियाणा में कमजोर आंकना भारी भूल होगी। और यदि भाजपा को केंद्र में सरकार बनाने में कोई दिक्कत आई तो हरियाणा में भाजपा ताश के पत्तों की तरह बिखर जाएगी । व चुनाव जीतना तो दूर उसका चुनावी रेस में टिकना भी आसान नही होगा।

  • चौधरी वीरेंद्र सिंह
    चौधरी वीरेंद्र सिंह को केंद्र में कैबिनेट मंत्री बनाया

अपने बूते पर पहली बार हरियाणा में भाजपा सरकार !

प्रदेश में भाजपा की अपने बूते पर पहली बार सरकार बनने में मुख्य रूप से केंद्र में भाजपा सरकार व मोदी लहर का होना, अप्रत्यक्ष रूप से आधा दर्जन के लगभग चेहरों को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार प्रदर्शित करना ,दूसरे दलों में तोड़-फोड़ करके काफी नेताओं को अपने साथ मिलाना व सिरसा स्थित डेरा सच्चा सौदा का खुलकर समर्थन मिलना इत्यादि प्रमुख कारण थे। 2014 के चुनाव में भाजपा ने प्रदेश के लगभग हर वर्ग को साधने की कोशिश की और उसमें वो काफी हद तक सफल भी रही । जाट बाहुल्य प्रदेश में भाजपा ने विधानसभा में 27 टिकटें जाट समुदाय को दी जोकि अन्य किसी दल के मुकाबले सबसे ज्यादा थी। इसके ईलावा भाजपा गैर-जाट वर्ग के प्रमुख समुदायों ब्राह्मण, अग्रवाल, अरोड़ा पंजाबी व यादवों को भी टिकटों में विशेष तरजीह देकर अपने साथ जोड़ने में सफल रही थी। नरेंद्र मोदी के पिछड़े वर्ग से सम्बंधित होने के कारण इन समुदायों के लोगो ने दिल खोलकर भाजपा का साथ दिया था।

चुनाव जीतने के बाद भाजपा की स्थायी जनाधार खड़ा करने की रणनीति !

भाजपा की अकेले अपने बूते हुई इस जीत से राजनैतिक विश्लेषक भी हरियाणा की राजनीति में नए अध्याय की शुरुआत मानने लगे थे, और भाजपा ने भी इस अवसर को भुनाते हुए स्थायी जनाधार खड़ा करने की रणनीति पर काम करते हुए कई निर्णय लिए थे। इसी के तहत भाजपा ने जाट व गैर-जाट का बैलेंस ( Balance ) बनाते हुए सरकार में इन वर्गों को प्रतिनिधित्व ( Representation ) देने की कोशिश की। जाट समुदाय में पकड़ बनाने के लिए वरिष्ठ जाट नेता चौधरी वीरेंद्र सिंह को केंद्र में कैबिनेट मंत्री बनाया वही सुभाष बराला को प्रदेश का अध्यक्ष व कैप्टन अभिमन्यु व ओमप्रकाश धनखड़ को हरियाणा सरकार की केबिनेट में प्रभावशाली महकमो से नवाजा गया। गैर-जाटों में राजनीतिक रूप से प्रमुख सक्रिय जातियों गुज्जर , यादव , राजपूत व ब्राह्मण को भी खुश करने की कोशिश की। इसी के चलते कृष्णपाल गुज्जर व अहीरवाल के बड़े नेता राव इंद्रजीत को केंद्रीय मंत्रीमण्डल में तो कंवर पाल गुज्जर को स्पीकर व राव नरबीर को हरियाणा सरकार का केबिनेट मंत्री बनाया गया। ब्राह्मण वर्ग के रामविलास शर्मा को प्रदेश की कैबिनेट में नंबर 2 का स्थान तो जी डी वत्स को राज्यसभा में भेजा। हरियाणा से सम्बन्ध रखने वाले पूर्व सेना अध्यक्ष वी के सिंह को  केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह देकर राजपूत समुदाय में पैठ बढ़ाने की कोशिश की।
भाजपा ने अपने परम्परागत वोट बैंक व व्यापारी वर्ग से सम्बंधित पंजाबी व अग्रवाल समुदाय को भी महत्वपूर्ण पदों पर एडजेस्ट ( Adjust ) किया । पंजाबी समुदाय से मनोहर लाल खट्टर मुख्यमंत्री , अनिल विज कैबिनेट मंत्री, मनीष ग्रोवर राज्यमंत्री व लगभग एक दर्जन निगमो व बोर्डो में प्रतिनिधित्व दिया तो अग्रवाल समुदाय से राज्यसभा सुभाष चंद्रा, दो केबिनेट मंत्री कविता जैन ,विपुल गोयल व एक राज्यमंत्री ज्ञानचंद गुप्ता व लगभग आधा दर्जन निगम व बोर्डो में प्रतिनिधित्व दिया।

  • अनिल विज
    अनिल विज कैबिनेट मंत्री

इसके बावजूद कंहा चूंकि भाजपा !

इतनी बड़ी सोशल इंजीनियरिंग ( Social Engineering ) व ठीक-ठाक प्रतिनिधित्व के बावजूद के बावजूद प्रदेश में भाजपा के प्रति बढ़ते असन्तोष ने पार्टी के थिंक टैंक्स ( Think tanks ) को सोचने पर मजबूर कर दिया है। जाट आरक्षण आंदोलन ने सबसे पहले भाजपा की रणनीति को गहरी ठेस पंहुचाई । इस आंदोलन से भाजपा को जाट और गैर जाट दोनो में समान रूप से नुकसान उठाना पड़ा। इस आंदोलन को कोई भी पार्टी का जाट नेता ढंग से टैकल ( Tackle ) नही कर पाया ।उसका सबसे बड़ा कारण रहा कि भाजपा के पास कागजो के ईलावा हकीकत में एकाद को छोड़कर कोई भी जमीनी जाट नेता नही है। भाजपा ने जाट कोटे से प्रतिनिधित्व तो दें दिया लेकिन जाटों ने कभी ये महसूस ही नही किया कि उनका सरकार में प्रतिनिधित्व है। कमोबेश यही स्तिथि ब्राह्मण समुदाय की भी है। लेकिन हैरानी की बात है कि पिछड़े वर्ग यानि बैकवर्ड क्लासेस ( Backwards Classes )जिसकी आबादी प्रदेश में सबसे ज्यादा 40 फीसदी के लगभग है और लोकसभा व विधानसभा चुनाव में जिनका भाजपा को जिताने में सबसे महत्वपूर्ण योगदान रहा है उसका हरियाणा सरकार में प्रतिनिधित्व न के बराबर है। ये भाजपा की चूक है या अनदेखी ये तो पता नही लेकिन ये अनदेखी प्रदेश भाजपा को समय आने पर बड़ा करंट लगा सकती है।

प्रदेश में भाजपा की वर्तमान स्तिथि!

जाट खुलकर भाजपा के खिलाफ मैदान में आ चुके हैं और आरक्षण के लिए दो उग्र आंदोलन इसके प्रत्यक्ष उदाहरण है । ब्राह्मण भी वर्तमान सरकार से खुश नही है और वो भी भाजपा के खिलाफ धीरे-२ मुखर हो रहे है। राजपूत पद्मावती के बहाने आक्रोश जता चुके है। गुज्जर व यादव अभी शांत है लेकिन सरकार के समर्थन में भी खुलकर सामने नही आ रहे है तो प्रश्न उठता है कि किस वर्ग या वोट बैंक ( Vote Bank ) के भरोसे भाजपा हरियाणा में अगली चुनावी वैतरणी पार करने की सोच रही है ! हालांकि ये सत्य है कि भाजपा का परम्परागत पंजाबी व अग्रवाल वोट बैंक पार्टी के प्रति और ज्यादा मजबूती से संगठित होकर जुड़ा है लेकिन इनकी संख्या का गणित पर्याप्त नही है और ये भी सच है कि ये राजनीतिक तौर पे अधिक ब्लंट ( blunt ) और सक्रिय नही हैं ।

गैर-जाट की राजनीति भी भाजपा से फिसलने लगी!

हिंसक जाट आंदोलन के बाद जाटों की नाराजगी के बावजूद भाजपा के रणनीतिकारों को गैर-जाटों ( non-jat ) के पार्टी के साथ लामबंद होने की उम्मीद बंधी थी। लेकिन समय-२ पर कई मुद्दों को लेकर गैर-जाट समुदायों का सरकार के खिलाफ खुला विरोध व प्रमुख गैर-जाट नेता राजकुमार सैनी द्वारा अपनी अलग पार्टी बनाने की घोषणा से भाजपा के लिए स्तिथि काफी पेचीदा हो गई है। गत विधानसभा चुनावों में भाजपा को ज्यादातर गैर-जाट के क्षेत्रों में सफलता मिली थी। कुलदीप विश्नोई द्वारा हजंका का कांग्रेस में विलय व कांग्रेस का नेतृत्व अशोक तंवर के हाथों में होने से भाजपा को गैर-जाट में भी असुरक्षा की भावना होने लगी है ।

राजकुमार सैनी के देवीलाल , भजन लाल, बंसीलाल, चौटाला, हुडडा व जाटों के खिलाफ विवादित दस ब्यान ! देखने के लिए नीचे क्लिक करें।
भाजपा की आंतरिक दिक्कत!

दिखाने के लिए मुख्यमंत्री मनोहर लाल के रूप में एक ईमानदार चेहरा जरूर उभरा है लेकिन मुख्यमंत्री के तौर पर उनको उन्ही की कैबिनेट से प्रॉपर टीम वर्क ( Team work )का सपोर्ट न मिलना , उनकी निजी टीम में ज्यादातर का अनुभवहीन होना व राजनैतिक व प्रशासनिक नियुक्तियों में सीधा बाहय हस्तक्षेप का होना उनकी छवि को साथ-2 वाश कर रहें हैं।भाजपा के साथ सबसे बड़ी दिक्कत ये है कि सारी पार्टी मोदी पर ही डिपेंड ( depend ) है। भाजपा के आधा दर्जन विधायकों को छोड़कर ज्यादातर “लहर वीर’ है यानी उनका खुद का जनाधार काफी सीमित है और वो पार्टी लहर पर सवार हो ही विधानसभा पंहुचे है।अतः सरकार और पार्टी की नीतियों को ग्राउंड ( ground ) तक ले जाने के लिए उनके पास इंफ्रास्ट्रक्चर ( infrastructure )नही है। इसलिए जनता के बीच विपक्षी पार्टियों के प्रचार का जवाब देने के लिए तंत्र का नितान्त अभाव है। दूसरी और कई केंद्रीय व प्रदेश के मंत्रियों की भी मुख्यमंत्री की गद्दी पर नजर है इस कारण वो भी सरकार की किरकिरी के बाट जोहते रहते है। पार्टी के पुराने व समर्पित कार्यकर्ता काफी स्थानों पर अफसरों की मनमर्जी व काम न होने के सवाल पर सार्वजनिक नाराजगी जाहिर कर चुके है। पार्टी कैडर में बढ़ती निराशा भाजपा के लिए चिन्ताजनक है।

भाजपा की आगामी रणनीति क्या हो सकती है।

अभी भाजपा सरकार का करीब सवा साल बाकि है। विधानसभा चुनाव से पहले लोकसभा चुनाव होने है। चर्चा है कि पार्टी लोकसभा में हरियाणा के आधे दर्जन से ज्यादा पिछले उम्मीदवारों की टिकेट बदलने की तैयारी में हैं। और इसके लिए पार्टी ने नए साफ छवि वाले मजबूत उम्मीदवारों की तलाश आरम्भ कर दी है। पूर्व सेना अध्यक्ष दलबीर सुहाग से राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की मुलाकात को इसी नजरिये से देखा जा रहा है। रोहतक, सोनीपत, करनाल, कुरुक्षेत्र, हिसार, सिरसा व भिवानी- महेंद्रगढ़ सीट पर काफी उथल-पुथल होने की संभावना है और पार्टी कई जगह नए चेहरों पर दांव लगा सकती है। और लोकसभा चुनाव में यदि ये प्रयोग सफल रहा तो आगामी विधानसभा चुनाव में वर्तमान विधायकों में से लगभग तीन दर्जन के करीब का पत्ता कटना तय है। कुल मिलाकर हरियाणा भाजपा का सारा दारोमदार लोकसभा चुनाव के प्रदर्शन पर टिका है।


By

जितेंद्र सिंह अहलावत

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