कलाम के बाद कोविंद ने किया सियाचिन का दौरा, किस हाल में रहते है सेना के जवान । सिटी तहलका में पढ़िए ।

president of india Ramnath kovind at shiachin
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बृहस्पतिवार को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद दुनिया की सर्वाधिक ऊंचाई पर स्थित युद्धक्षेत्र सियाचिन पहुंचे ! ऐसा करने वाले ए पी जे कलाम के बाद वे दूसरे राष्ट्रपति हैं ।उन्होंने सेना के बेस कैंप का दौरा कर वहां तैनात जवानों के प्रति आभार प्रकट किया । राष्ट्रपति कोविंद ने कहा कि वह विश्वास दिलाने आए हैं कि हर देशवाशी और भारत सरकार सैनिक और उनके परिवार के साथ खड़े हैं। यहां पर तैनात हर सैन्यकर्मी और अधिकारियों के प्रति हर भारतवासी के मन में अलग से विशेष सम्मान है ।

A.P.J Kalam ex president of india at siachin

कोविंद ने कहा राष्ट्रपति व तीनों सेनाओं के सर्वोच्च कमांडर के नाते आज वह उनके बीच सैनिकों के लिए पूरे देश का आभार संदेश लेकर आए हैं । उन्होंने कहा कठोरतम प्राकृतिक चुनौतियों के बीच देश की रक्षा में लगे हुए वीर जवानों से आमने सामने मिलना मेरे लिए गर्व की बात है। कोविंद ने सेना के सैनिकों को दिल्ली आने पर राष्ट्रपति भवन देखने आने का निमंत्रण दिया।

 

राष्ट्रपति ने सियाचिन युद्ध स्मारक में भी श्रद्धांजलि दी। यह स्मारक देश की रक्षा के लिए 11000 सैनिक और अधिकारियों के बलिदान की निशानी है। सियाचिन का तापमान शून्य से 52 डिग्री सेल्सियस नीचे तक चला जाता है और यंहा मौसम के कारण ही कई कई सैनिक अपनी जान गंवा देते है। कोविंद सियाचिन दौरा करने वाले दूसरे राष्ट्रपति हैं। इससे पहले अप्रैल 2004 में पूर्व राष्ट्रपति एपीजे कलाम ने सियाचिन का दौरा किया था ।

 

यंहा ये उल्लेखनीय है कि अप्रैल 1984 में ऑपरेशन मेघदूत के तहत भारतीय सेना ने सियाचिन में प्रवेश किया था। 1972 में भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद शिमला समझौता में सियाचिन के एनजे-9842 नामक स्थान पर युद्ध विराम की सीमा तय की गई थी। इस बिंदु के आगे के हिस्से के बारे में कुछ नहीं कहा गया था। अगले कुछ वर्षों के बाद बाक़ी के हिस्से में गतिविधियाँ होने लगीं। पाकिस्तान ने कुछ पर्वतारोही दलों को वहाँ जाने की अनुमति दे दी ओर पाकिस्तान के कुछ मानचित्रों में यह भाग उनके हिस्से में दिखाया गया। इससे चिंतित होकर भारत ने “आपरेशन मेघदूत”के ज़रिए एनजे-9842 के उत्तरी हिस्से पर अपना नियंत्रण किया।

army men are taking position

कैसा है सियाचिन में सैनिकों का जीवन

सियाचिन गुलाब के कांटे सैनिकों के लिए काफ़ी चुभने वाले साबित हुए हैं। बेस कैंप से भारत की सबसे दूर चौकी इंद्रा कॉल है और वहाँ तक पैदल जाने में लगभग 20 से 22 दिन का समय लग जाता है।चौकियों पर जाते समय सैनिक एक के पीछे एक लाइन में चलते हैं और सब की क़मर में एक रस्सी बँधी होती है ताकि अगर कोई एक व्यक्ति खाई में गिरने लगे तो बाकी लोग उसे बचा सकें। ऑक्सीजन की क़मी होने की वजह से उन्हें धीमे-धीमे चलना पड़ता है । रास्ते में हज़ारों फ़ुट ऊँचे पहाड़ या हज़ारों फ़ुट गहरी खाइयाँ है और न पेड़-पौधे, न जानवर, न पक्षी। इतनी बर्फ़ है कि अगर दिन में सूरज चमके और उसकी चमक बर्फ़ पर पड़ने के बाद आँखों में जाए तो आँखों की रोशनी जाने का ख़तरा हो जाता है। ईन हालात में सैनिक कपड़ों की कई तह पहनते हैं और सबसे ऊपर जो कोट पहनते हैं उसे “स्नो कोट” कहते हैं।

वहाँ टेंट को गर्म रखने के लिए एक ख़ास तरह की अँगीठी का इस्तेमाल किया जाता है ।इसमें लोहे के एक सिलिंडर में मिट्टी का तेल डालकर उसे जला देते हैं। इससे वो सिलिंडर गर्म होकर बिल्कुल लाल हो जाता है और टेंट गर्म रहता है।

सैनिक लकड़ी की चौकियों पर स्लीपिंग बैग में सोते हैं, मगर ख़तरा सोते समय भी मँडराता रहता है क्योंकि ऑक्सीजन की कमी की वजह से कभी-कभी सैनिकों की सोते समय ही जान चली जाती है। इस स्थिति से बचाने के लिए वहाँ खड़ा संतरी उन लोगों को बीच-बीच में उठाता रहता है और वे सभी सुबह छह बजे उठ जाते हैं। वहाँ पर नहाने के बारे में सोचा नहीं जा सकता और सैनिकों को दाढ़ी बनाने के लिए भी मना किया जाता है क्योंकि वहाँ त्वचा इतनी नाज़ुक़ हो जाती है कि उसके कटने का ख़तरा काफी बढ़ जाता है और अगर एक बार त्वचा कट जाए तो वो घाव भरने में काफ़ी समय लगता है।

helicoper cheeta at work

वहाँ लगभग तीन महीने सैनिक तैनात रहते हैं और उस दौरान वो बहुत ही सीमित दायरे में घूम फिर सकते हैं। सियाचिन पर बनी सैनिक चौकियों की जीवन रेखा के रूप में काम करती है वहाँ वायु सेना का उन ” चीता हेलिकॉप्टर ही उतर पाता है। सेना का कहना है कि उन्हें जिन ऊँचाइयों पर रहना होता है वहाँ सिर्फ़ यही हेलिकॉप्टर काम कर सकता है। सबसे ऊँचाई तक जाने और सबसे ऊँचाई पर बने हेलिपैड पर लैंड करने वाले हेलिकॉप्टर का रिकॉर्ड इसी के नाम है।


By
नीरज कुमार

{ विशेष संवाददाता }

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