करनाल लोकसभा सीट से भाजपा में ब्राह्मण लॉबी फिर हुई सक्रिय ।। पूंडरी के निर्दलीय विधायक दिनेश कौशिक ने रक्षाबन्धन के लगाए बड़े-२ होर्डिंग्स।।

करनाल पानीपत राजनीति विशेष स्टोरी

27 . अगस्त , करनाल

|| राजनीति  विशेष||


हालाँकि आजकल भाजपा से करनाल लोकसभा सीट से पंजाबी समुदाय के अश्वनी चोपड़ा सांसद है लेकिन चुनावो को नजदीक देख ब्राह्मण लॉबी ने भी अपनी सक्रियता बढ़ा दी है। ये सीट परम्परागत रुप से ब्राह्मण सीट रही है। हरियाणा बनने से लेकर अब तक इस सीट पर 13 बार ( 12 आम चुनाव व एक उपचुनाव 1977 ) चुनाव हुए हैं जिनमें 10 बार ब्राह्मण उम्मीदवार विजय रहे हैं। यंहा से एक बार जाट (1977 का उपचुनाव ) महेंद्र सिंह लाठर, एक बार बिश्नोई चौ भजन लाल ( 1998 ) और वर्तमान में पंजाबी बिरादरी से अश्वनी चोपड़ा (2014) को छोड़ दे तो हर बार बाजी ब्राह्मण जाति के प्रत्याशी के हाथ ही लगती रही है। यंहा से 7 बार कांग्रेस से तो 2 बार भाजपा से ब्राह्मण उम्मीदवार विजयी रहें है। हरियाणा में ब्राह्मण बिरादरी के सिरमौर रहे पंडित भगवत दयाल शर्मा भी 1977 में यंहा से सांसद रह चुके हैं। यंहा से सबसे ज्यादा बार सांसद रहने का श्रेय भी ब्राह्मण समुदाय को जाता है। कांग्रेस के पंडित चिरन्जी लाल यंहा से लगातार तीन बार सांसद रहे हैं। वोटों के हिसाब से भी इस लोकसभा में ब्राह्मणों की तादाद सबसे ज्यादा है। दूसरे नंबर पर इस सीट पर जाट मतदाताओं की संख्या है। रोड़ व पंजाबी समुदाय लगभग बराबर की संख्या में तीसरे नंबर है। उसके बाद राजपूत समाज आता है।

भाजपा में पंजाबी उम्मीदवारों का उद्भ्य
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करनाल और पानीपत दोनों शहरी सीटें है और इन दोनों सीटों पर पंजाबी समुदाय बहुतायत में हैं और भाजपा की सबसे ज्यादा पैठ पंजाबी समुदाय में ही हैं। भाजपा में इन दोनों जगहों पर एकाध नेता को छोड़कर सभी स्थानीय बड़े नेता पंजाबी समुदाय से ही आते रहे है। एक मायने से इन दोनों जगहों पर पंजाबी समुदाय का शुरू से ही वचर्सव रहा है। तो काफी लंबे समय से हर चुनाव के समय लोकसभा से यंहा पंजाबी उम्मीदवार की मांग यहां के स्थानीय नेताओं द्वारा उठती रही है और इसी के मद्देनजर भाजपा पंजाबी बिरादरी के पानीपत शहर से पांच बार विधायक रहे फतहचन्द विज को 1991 में करनाल सीट से लोकसभा का चुनाव लड़ा चुकी है। भाजपा का ये प्रयोग फ्लॉप रहा था और विज बुरी तरह चुनाव हार गए थे। हालाँकि कांग्रेस ने इस सीट पर कभी ज्यादा प्रयोग नही किए ।कांग्रेस के दिग्गज नेता पूर्व मुख्यमंत्री भजन लाल जिनकी ब्राह्मण समाज मे भी समान पैठ थी के दो चुनावों को छोड़कर कांग्रेस ने हर बार ब्राह्मण उमीदवार पर ही दांव खेला है।
लेकिन भाजपा में इसके उलट स्थानीय स्तर पर पंजाबी उम्मीदवार की कसक हर बार देखी जा सकती हैं। गत लोकसभा 2014 के चुनावों में भी यंहा से पंजाबी बिरादरी से मुख्यमंत्री मनोहर लाल,नीतिसेन भाटिया व चन्द्र कथूरिया टिकेट के प्रबल दावेदार थे। इस दौरान पंजाबी समुदाय से ही सम्बन्धित सन्त ज्ञानानंद का नाम भी सामने आया था। हइवोल्टज ड्रामे व ऊपरी स्तर पर संघ में स्थापित पंजाबी समुदाय के हस्तक्षेप के चलते पंजाब केसरी दिल्ली के मालिक अश्वनी चोपड़ा (पंजाबी समुदाय ) टिकट लाने में कामयाब रहे व मोदी की ज़बरदस्त चल रही आंधी के बूते काफी मार्जन से चुनाव जीतने में भी सफल रहे। पहले 2009 के लोकसभा चुनावों के दौरान भी पंजाबी समुदाय से भाजपा के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष आत्मप्रकाश मनचंदा , नीतिसेन भाटिया, रोजी मलिक पूरे दमखम के साथ टिकट की दौड़ में उतरे थे ।

चोपड़ा की जीत से पंजाबी उम्मीदवारों की संख्या में हुई बडौतरी।
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2014 के चुनावों में अश्वनी चोपड़ा की भारी- भरकम जीत से स्थानीय भाजपा के पंजाबी नेताओं के चेहरे पर चमक साफ देखी जा सकती है। चोपड़ा की स्थानीय जनता से संवादहीनता में ज्यादा रुचि न लेने व उनके खिलाफ चल रही एंटी-इनकंबेंसी के चलते आने आने वाले लोकसभा चुनाव के लिए पंजाबी बिरादरी के टिकटार्थियों की संख्या में इजाफा हुआ है। इन टिकटार्थियों को लगता है कि अश्वनी चोपड़ा की टिकट कटने की सूरत में अगली टिकट पंजाबी समुदाय में ही जाएगी। अगले चुनाव के लिए करनाल लोकसभा से पंजाबी समुदाय से स्वामी ज्ञानानन्द, चन्द कथूरिया, संजय भाटिया, प्रमोद विज, नीतिसेन भाटिया व गजेंद्र सलूजा के नाम मुख्य रूप से उभर कर आ रहे हैं।

भाजपा में ब्राह्मण लॉबी भी हुई सक्रिय।
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चुनाव नजदीक आते देख भाजपा के अंदर ब्राह्मण लॉबी भी सक्रिय हो गई है और कुरुक्षेत्र लोकसभा के अंतर्गत आने वाले पूंडरी के विधायक जोकि भाजपा को समर्थन दे रहे है द्वारा करनाल लोकसभा में जगह-२ अपने नाम से बड़े-२ बोर्ड व होर्डिंग्स लगाना उसी कड़ी का हिस्सा माना जा रहा है। भाजपा की टिकट पर ब्राह्मण समुदाय से पूर्व केंद्रीय गृह राज्यमंत्री आई डी स्वामी दो बार इस सीट से सांसद रह चुके हैं। भाजपा के कई छोटे व बड़े ब्राह्मण नेता इस सीट से लोकसभा चुनाव लड़ने की इच्छा रखते हैं। हरियाणा सरकार के शिक्षा मंत्री रामविलास शर्मा काफी लंबे समय से इस सीट से चुनाव लड़ने की इच्छा रखते हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव के समय भी ब्राह्मण समाज से आई डी स्वामी व रामविलास शर्मा जोकि उस समय पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष थे ने करनाल लोकसभा से चुनाव लड़ने के लिए योजनाबद्ध तरीके से फील्डिंग लगाई थी लेकिन ऐंन मौके पर एकता शक्ति पार्टी के मराठा वीरेंद्र वर्मा ने भाजपा में शामिल होकर अपनी दमदार दावेदारी पेश कर ब्राह्मण लॉबी की मुहिम को आघात पंहुचा दिया। मराठा चूंकि रोड बिरादरी के थे तो उनकी टिकट के खिलाफ उस समय पंजाबी और ब्राह्मण लॉबी एक हो गई थी व योजनाबद्ध तरीके से करनाल लोकसभा की सीट हजकां को देकर चंद्रमोहन को उम्मीदवार घोषित करवा दिया गया। चंदमोहन का विरोध होगा , ये जग-जाहिर था। लेकिन वीरेंद्र मराठा पेशंस खो भाजपा से चले गए। मराठा के जाने के बाद करनाल सीट भाजपा ने हजका से वापिस ले ली । लेकिन तब तक ब्राह्मण लॉबी के लिए देर हो चुकी थी क्योंकि सोनीपत लोकसभा सीट से ब्राह्मण उम्मीदवार (रमेश कौशिक ) घोषित हो चुका था। प्रदेश की 10 सीटों में से दो सीटें ब्राह्मण समुदाय को देना असम्भव था। मराठा के खेल में बाजी पंजाबी लॉबी के हाथ लग गई और ब्राह्मण उम्मीदवार एक बार फिर रेस में पिछड़ गए ।

ब्राह्मण समुदाय से टिकट के चाहवान
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भाजपा में अश्वनी चोपड़ा की टिकट कटने की सूरत में ब्राह्मण समुदाय से सोनीपत के सांसद रमेश कौशिक, शिक्षा मंत्री रामविलास शर्मा व पूंडरी के निर्दलीय विधायक दिनेश कौशिक , बालकिशन शर्मा एडवोकेट व आई डी स्वामी मुख्य रूप से मैदान रहने की उम्मीद है। कांग्रेस से दो बार सांसद रहे अरविंद शर्मा जोकि आज कल किसी पार्टी में नही है व कई बार सार्वजनिक रूप से भाजपा के कार्यक्रमों में शामिल हो चुके हैं। यदि अरविंद शर्मा भाजपा में शामिल होते है तो ब्राह्मण समुदाय से वे सबसे प्रबल दावेदार बनकर सामने आ सकते हैं।

करनाल लोकसभा सीट पर बाहरी उम्मीदवार नही है मुद्दा।
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करनाल लोकसभा सीट पर बाहरी उम्मीदवार होने के मुद्दे ने कभी भी क्लिक नही किया है। 1967 व 1971 में माधो राम व 1977 के उपचुनाव से सांसद बने महेंद्र सिंह लाठर को छोड़ दे तो अब तक इस सीट से सांसद बने सभी लोग इस संसदीय क्षेत्र से बाहर के हैं। इनमे भगवत दयाल, चिरन्जी लाल, भजन लाल, आई डी स्वामी, अरविंद शर्मा व अब अश्वनी चोपड़ा आते है। मजेदार बात ये है कि चुनाव जीतने के बाद इन सांसदों में ज्यादातर ने करनाल में अपना निवास स्थान बनाया तो कईयों ने तो अस्थायी भी निवास नही बनाया।

 


by

जितेंद सिंह
सिटी तहलका
पानीपत।।

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